
कॉपी, कट, और पेस्ट वाले संविधान को अबकी साठ साल पूरे हो गए. ताई जी सुबह सुबह तिरंगा लहरायेंगी और ताऊ शाम होते ही उसे उतार लेंगे. इन साठ सालों में 25 झंडे चढ़ते-उतरते तो जरूर देखा है आज के दिन. हरेक साल बस यही सोचता रहा की ये जश्न किसके लिए? ये शक्ति प्रदर्शन किसके लिए? ये धमा-धम फायरिंग किसके लिए? तोपों की सलामी किसके लिए? रोकेट की कला-बाजियां किसके लिए? झांकिया हर राज्य की किसके लिए? भव्य परेड किसके लिए? 10 दिन पहले से इंडिया गेट की रूट का ट्राफिक जाम किसके लिए? कबूतरों को उड़ाया जाना किसके लिए? कैदियों को रिहा करने की कवायद किसके लिए? दिखाने के लिए या देखने के लिए?
इतना सब कुछ सोचने के बाद हर साल मै एक ही सवाल पर ठहरता हूँ, "जिस देश में अभी भी लाखों लोगों की आमदनी 20रुपये प्रतिदिन है, उस देश में में अरबों का खर्चा एक दिन में... किसके लिए?"
राहुल बाबु
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी नयी-नयी सृजन "किसके लिये" पढा । आपके लेखन कौशल पर तो मैं प्रश्न नहीं ही उठा सकता । हां मै आपकी बातों से सहमत नही हुं ।
"किसके लिये" .....बड़ा ही गुढ़ प्रश्न किया है आपने । अब बदले में मै ये कहुं कि ये जरूरी हिस्सा है तो बात बनती नहीं दिखेगी ।
बस एक कुतर्क देना चाहुंगा...आपके, मेरे या दोस्तों के घर मे जब शादी या कोई समारोह होता है तब हम सब अपनी-अपनी हैसियत के हिसाब से खर्च करते हैं । याद रहे उस समय भी हमारे गाँव-मुहल्ले में कोइ भूखा सो रहा होता है,कोई बेटा इस गम में रो रहा होता है कि वह माँ के लिये दवाई नहीं ला पाया ।
बस से चलने के बजाय ऑटो से चलना पसंद करते हैं, महीने में सकडों रूपये धूम्रपान में उड़ा देते हैं । घर के फर्श को तुड़्वा कर मार्बल लगाना ज्यादा सही लगता है वहीं पड़ोस मे किसी तवे पर छप्पर से टपकी पानी की बुंदें झुलसती रहती है ।
साहब ये सब भी तो पैसों का दुरुपयोग है ।
कूट्नीति, राजनीति और जरूरतों में सामंजस्य होना बहुत जरूरी है । और हां मेरे हिसाब से प्राथमिकतायें तय होनी चाहिये ।
आपका शुभेक्षु
शशि सागर
एक दो दिन ही तो बचे है जिस दिन देश प्रेम मुखर होता है कुछ पल के लिए ...मना लेने दीजिये ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंगणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ...!!
(1)आज का ये त्यौहार हमारा सब भारतवासीओं के लिये।
प्रत्युत्तर देंहटाएं(2) उन महात्माओं के लिये जिन्हों ने हमें आज़ादी दिलाई।
(3)हमारी सरज़मीन/हमारे प्यारे वतन के लिये।
मुबारक हो आप सबको आज का ये पर्व।
सागर साहब,
प्रत्युत्तर देंहटाएंपते की बात कही है आपने... आप फ़िज़ूल खर्ची की बात कर रहे हैं पर मैं सिर्फ़ फ़िज़ूल खर्ची की बात नहीं कर रहा. अगर इस आज़ादी का जश्न आम लोगों के लिये होता तो उन्हे शायाद दस-बीस-पचास-सौ या दो सौ का टिकट नहीं लेना होता अपनी ज़मीन का जश्न देखने के लिये.
जहां तक फ़िज़ूल खरची का सवाल है तो शादी-ब्याह, जनेऊ-मुंडण आदि में होने वाले खरचे भी बे-मतलब हैं.. कोई दो-राय नहीं है.
राहुल दा आपका आलेख "किसके लिए" सही मायने में लोकतंत्र से ही एक सवाल है |जहाँ गणतंत्र और स्वतंत्र होने के भी दिवस कों मनाया जाता है |शाब्दिक प्रबुधता से देश का कल्याण नहीं हो सकता है |इस देश में लिखने वालो की कोई कमी नहीं है जो अपनी शाब्दिक पटुता से देश हित की कागजी बातें करते करते खुद कों ख़तम कर लेते है लेकिन सुधार के नाम पर बासठ सालो में तो कुछ भी देखने कों नहीं मिलता |ये सवाल सिर्फ आपके मन में ही नहीं कौंध रहा होगा |कल से आज तक मैं ने करीब दस आलेख पढ़ें है |सब अपना भड़ास सिर्फ शब्दों में निकालकर शांत हो जायेंगे फिर अगले साल गणतंत्र आयेगा और खुद कों आम आदमी के लेबल से चिपकाकर ये अगली बार फिर लिखेंगे जिनके इन्हें चन्द पैसे मिल जायेंगे | शब्द देश का कल्याण करते तो शायद किसके लिए सवाल का जवाब आपको मिल पाता
प्रत्युत्तर देंहटाएंrahul...tumne jo kaha main bhi yahi sochti hun ki itni fizool kharchi kiske liye...bahut achha likha hai..
प्रत्युत्तर देंहटाएंमानस दो तरह से हल्का होता है। लिख कर,बतला कर, पीड़ा को जतला कर - पर पीड़ा पर की कौन दूर करे
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