बृहस्पतिवार, 11 मार्च 2010

धर्म के ना रंग होते, अधर्म फिर होता नहीं…

जीत के आगे छुपा,
है लोभ का कोहरा घना…
हार कर देखा है मैंनें,
शर्म से जो मुंह बना..

परिणाम गर होते नहीं तो,
कितना सुन्दर दृश्य होता..
फिर विफल होता ना कोई,
और ना कोई दिव्य होता…

न कर्ण ही तब छला जाता,
और न लंका जला जाता…
दूर उस एक गांव में फिर,
नक्सली ना पला जाता..

धर्म के ना रंग होते,
अधर्म फिर होता नहीं…
बेफ़िक्र हो सोते सभी,
बच्चा कोई रोता नहीं…

6 comments:

  1. जीत के आगे छुपा,
    है लोभ का कोहरा घना…
    हार कर देखा है मैंनें,
    शर्म से जो मुंह बना॥

    ये जीत भी एक हार है जिसमे लोभ का हो पनाह |
    धर्म और अधर्म के आगे बेबस है आम जहाँपनाह ||

    शब्दों की माकुलिअत आपकी अभिवयक्ति में डूबकर पढने कों मजबूर करती है सधी और सशक्त लेखन के इस जज्बे कों इस नाचीज का सलाम आपका अनुज गौतम

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  2. bahut sundar rahul.
    abhi tak ki sari kavitaun me mujhe avval laga.
    shukriya.....itni achhi rachna padhane ke lie

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  3. rahul...ab tum reality likhne lage ho aur tumhari writings din b din aur mature hoti jaa rahi hain...kya kahun behad khoobsurat lines...and inspirational though
    हार कर देखा है मैंनें,
    शर्म से जो मुंह बना

    meri favorite ye hain

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  4. अच्छा लिखा है ..दुष्यंत कुमार की याद दिलाता है ये तेवर....
    इस ब्लॉग पर आपकी कई पोस्ट आज पढ़ी.....मैं भी खुद को लोगो से इसी तरह उलझते हुए पाती हूँ अक्सर .
    धारण के नाम पर जो fanaticism हावी है वो सभी जगह दीखता है , ट्रेन में पंडित जी जैसे कई लोग मिल जायेंगे ...

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  5. धारण के नाम पर जो fanaticism हावी है
    sorry ..it is dharm ke naam par...

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