
कैपिटल कोर्ट, मुनिरका. ऑफ़िस से आने के बाद एक बिगड़े दोस्त को समझाना था. दो-चार फिलोसॉफी पिलानी थी. और यह तब तक मुमकिन नहीं था जब तक उसे बीयर ना पिलाऊं. ठेके से दो बीयर की बोतल ली. बगल के पनवाड़ी से एक डिब्बी सिगरेट ली. और वहीं बने दो-चार चबूतरॊं में से एक पर बैठ गया. बैठते ही बच्चों का हुजूम वहां आ पहुंचा. कुल दस-बारह बच्चे होंगे. सब के हाथ में एक-एक ओपनर.
“भैया! ओपनर लो, पैसा नहीं लगेगा बस बीयर की खाली बोतल हमें दे देना…”
“हम खुद ही खोल लेंगे, जाओ यहां से”, मैनें झिड़क दिया. मैं किसी को भी ऐसी हालात में कुछ देना पसंद नहीं करता. ’सहानुभूति’ और ’तरस’ जैसे शब्दों से मुझे बहुत नफ़रत है.
पता नहीं अचानक मुझे क्या हुआ कि मैनें उस हुजुम में खड़ी एक बच्ची को बुलाया और उसे एक रुपये का सिक्का देकर उससे ओपनर लिया. मुझे बुरा लगा. एक रुपये से उसकी ज़िंदगी में कौन सा आमूलचूल परिवर्तन होने वाला था? अगर देना ही था तो कुछ और देता. एक बेहतर ज़िंदगी!
मैनें उन सारे बच्चों को यह कहकर भगाया कि पीने दो, बोतल तब लोगे ना जब ये खाली होगी. वो चले गये. हमने बीयर पीना शुरु किया.
अभी आधी बोतल बची ही थी कि एक बच्ची मेरे पास आके बैठ गयी और सिफ़ारिश करने लगी कि मैं ये ख़ाली बोतल उसे दे दूं.
उधर से एक बारह-तेरह साल का बच्चा आया और मुझे बोलने लगा कि ये बोतल उसे चाहिये. उसका लहज़ा सख्त था. लड़की ने कहा – “भैया ये बोतल बेच कर गुटखा खायेगा, इसे मत देना”
मैनें पूछा – “तुम क्या करोगी इसे बेचकर?”
मुझे एक बोतल के तीन रुपये मिलेंगे, दो बोतल के छ: हो जायेंगे. मैं मम्मी को दे दूंगी तो कल की सब्जी हो जायेगी.
वो लड़का इस बच्ची के हाथ मरोड़ने लगा. उसे धमकाया भी. मैनें उसे डांट कर भगाने की कोशिश की. पर उसने उल्टे मुझे धमकी दी कि अगर मैनें उसे ये बोतल ना दी तो वो पुलिस को बतला देगा. वो उस बच्ची को मारने लगा. मुझे ताज्जुब हुआ. गुस्सा भी आया. मैं उसपे हाथ तो न उठा सका लेकिन उस बच्ची को उसके गिरफ़्त से निकालकर अपने पास बिठा लिया. लड़का टस से मस ना हुआ. बुदबुदाया – “थोड़ी सी बची है, अगर पूरी बोतल भरी होती न तो बताता.” मैं डरा तो नहीं पर उसके गट्स को देखकर उसके लिये आशंकित ज़रूर था.
बच्चा-जात में भी वही महिला शोषण! या फिर ग़रीबी की कुंठा! या सेल्स की भांति सेट किये हुए किसी टार्गेट को पूरी करने की भूख! कुछ तो ज़रूर था! उसकी कुंठा इसकी पुष्टि कर रहा था.
“मैं देखता हूं, मेरे सिवा कौन ये बोतल ले जाता है?”, एक अजीब सा तेवर था उसके पास. ये तेवर उसे आगे कहां ले जायेगा, क्या पता? पर उसका आज ख़तरे में था जिसे सुधार पाना मेरे लिये मुमकिन नहीं था.
बोतल मुंह में ही लगी थी. अभी खतम नहीं हुई थी कि वो लड़का और उसके साथ दो-चार और झपट पड़े. वो लड़की चुपचाप बैठी रही. उसकी सूखी और झुकी आंखे, उदास चेहरा, और निर्बल हाव-भाव मानो कह रहा हो कि अब उनका क्या चलेगा इन लड़कों के सामने.
अब लड़ाई उस लड़के और लड़की के बीच से निकल चुकी थी और मर्दाना जंग बन चुकी थी. चार लड़के. क़रीब एक ही उमर के. चारो एक-दूसरे के उपर. मानों बोतल नहीं सोने की बिस्किट हो. शायद उनके लिये यही हो…! या फिर ये लड़ाई थी दंभ की, स्वाभिमान की, भूख की… या शायद एक झूठी जीत की.
मैंने उनसे ज़ोर-ज़बरदस्ती बोतल छीन ली, उन्हे भगाया और उस बच्ची की तरफ़ बोतल बढ़ा दिया.
वो बोली – “भैया!! इसमें अभी बची है, पी लो तब दे देना.”
बचपन में ही वो बच्ची मातृत्व का भाव लिये, और वो बच्चा भेड़िये की शक्ल मे दिखा. सड़कों पर क़िस्मत टटोलता, हाथ फैलाता, गुटखा चबाता, बीड़ी पीता ये तीन फ़ीट का फ़्रेम भी उसी मानसिकता का है जिसे हमारा समाज ढो रहा है. क्या कोई भगवान है जो इस भटकते बचपन को एक नई राह दे सके. यक़ीनन नहीं! ये दोष किसके उपर मढूं.
मन ग्लानि से भरा रहा कि काश! मैं इनके लिये कुछ कर पाता!! और फिर बेशर्मों की तरह वहां से वापस अपनी झोपड़ी की ओर चल पड़ा.
बोतल और बच्चों की लड़ाई को लेकर जो कहानी आपने यहां पोस्ट की है वो अपने अंदर बहुत कुछ समेटे हुए है. जैसे बालपन में भी लड़्कों का कुछ साबित करने का दंभ.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमात्र ६/ के लिए टकतकी लगाए देखती गरीबी और आपको बियर पीते हुए देखती उस बच्ची के मन में उमड़ते लाखों ख्याल. हो सकता है कि वो केवल यही सोच रही हो कि कब आप खत्म करेंगे और कब उसे बोतल के रुप में छ रुपए मिलेंगे.
अंत में उस लड़की का यह कहना कि वो पैसे मां को देगी ताकि सुबह में सब्जी आ सके. उसके इस एक लाईन में भी कफि कुछ छिपा हुआ है.
बहुत गहन विचार करने की जरुरत है इस पक्ष पर. एक पूरी सामाजिक व्यवस्था में बदलाव और सोच में बदलाव!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत उम्दा आलेख.
शराब की दुकान के आसपास घुमने वाले इन बच्चो की भी एक अपनी दास्ताँ हैं, इन पर बनी एक लघु चित्रकथा देखी थी कुछ समय पहले!!! बियर बोतल के अलावा ये बच्चे पानी की बोतल और प्लास्टिक के गिलास लेकर भी घूमते रहते हैं!!! इनका आज और कल दोनों ख़राब हो रहें हैं, कौन हैं जिम्मेदार इसके लिए??? कहीं भविष्य का अपराध तो नहीं पल रहा इन शराब की दुकानों के आसपास??? बहुत सारे प्रश्न हैं जो इन को देखकर दिमाग में घुमने लगते हैं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सारी चीजे जब घटित होती है जिसमे हम सिर्फ दर्शक होते है ...ओर वही बने रह सकते है .....ये अनुभव हमें सिर्फ एक जींस के एक समय में किसी कोख में जाने की इम्पोर्टेंस बताते है .जिसे आम भाषा में किस्मत कहा जाता है ........इन हकीक़तो से कई बार रूबरू होता हूँ.....फिर आह्सिता आहिस्ता इग्नोर करना सीखने लगा हूँ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंवो बोली – “भैया!! इसमें अभी बची है, पी लो तब दे देना.”
प्रत्युत्तर देंहटाएंबचपन में ही वो बच्ची मातृत्व का भाव लिये, और वो बच्चा भेड़िये की शक्ल मे दिखा.
humare aas paas itna kuch hota hai jise dekh kar hum bas afsos kar paate hain, use bachchi ko us waqt botal mil gayi par kya itna kaafi hai...
rahi baat mamta ke bhaav ki to ye aurat, mahila, ladkiyan jo bhi roop ho ye bhaav to nature mein shaamil hai...chhoton ki badon ki parwah karna...naa apni khwahishein maar kar doosron ko khushi dena ye nature mein hi is kadar racha basa hai ki ise nikala nahi ja sakta aur meri nazar mein ismein koi burai bhi nahi hai...bas ek khaas tarah ki khushi dikhti hai tyaag mein mamta mein...
आपने इस आलेख के माध्यम से समाज और समाज की मनोदशा का जो चित्रण किया है , वास्तव में वो एक गहन चिंतन का विषय है | शायद हम निरीह और मूक बनकर इन्हें देखते रहते है |आपने तो कम से कम बीयर की वो बोतल गटकने के बाद उसे उस लडकी को थमाया |लेकिन वो दिन भर शायद भूखे पेट इन बोतलों को जमा करने में अपना वक्त जाया करती होगी | तब उसे कहीं पेट भरने के लिए सब्जी और रोटी की आस होती होगी |मर्म आपकी लेखनी की प्रवाह में सन्निहित है |वाकई बढ़िया लिखा है आपने |
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपका अनुज सचदेव
हमारे आस-पास हर वक़्त बहुत कुछ ऐसा घटित होता रहता है जो हमें झकझोरता तो है लेकिन यह झकझोरना क्षणिक होता है। काश कि हम इन सब मुद्दों पर खुल कर कुछ कर पायें।
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