
हरिद्वार जाना पडा!! वर्ना ना तो अपनी दिलचस्पी हर की पौड़ी पर होने वाली महा-आरती में थी, ना ही ऊँचे पहाड़ो पर सोने में लिपटी मनसा देवी में. ना ही चंडी देवी से कोई राफ्ता रखता हूँ, ना ही ऋषिकेश में बने राम और लक्ष्मण झूले से. पर जाना बुरा था ऐसा नहीं कहूंगा. ऊंचे-ऊंचे पहाड़, लम्बे-लम्बे सागवान के पेड़, छोटी और घुमावदार सड़कें, शताब्दी एक्सप्रेस से ज़्यादा के स्पीड में दौडती जल-धाराएं, जंगलों और पहाडो के बीच से निकलती छुक-छुक गाडी. ऊंचाई पर गाडी पार्क कर नीचे बसे हरिद्वार को देखने का मज़ा वाकई शानदार था. बंदरों और लंगूरों की खिलवाड़, खच्चरों की जिद, सूरज की तपिश को चुनौती देती ठंडी हवाएं, और रह-रह कर चीखने वाला 'खोया-पाया' अनाउन्समेंट... सब कुछ मजेदार लगा.. यहाँ तक की जटाधारी साधुओं की हुडदंग भी. चोटीवाला रेस्तौरेंट से लेकर सड़क किनारे ढाबे भी ठीक-ठाक ही लगे. वैसे भी खाने के मामले में कोई ख़ास चोइस है नहीं अपनी सो जो मिल जाए डकार लेता हूँ.
दिल्ली से रात २ बजे निकला. मुनिरका से ऑटो किया. कमबख्त मीटर से चलने को तैयार तो हुआ लेकिन ऐसे रास्ते घुमा के ले गया की १५० रुपये किराया बन गया. जितना आई.एस.बी.टी से हरिद्वार का भी नहीं है. सुबह ९ बजे मैं हरिद्वार में था. १० बजे मेरे प्रिय जन भी आ गए जिनकी वजह से मुझे जाना पडा था. मां, बाबु जी, भैया, भाभी, कोमल और मयंक. पूरा परिवार. हरिद्वार स्टेशन से जब बाहर निकला तो वहां पंडों की लाईन लगी थी जो जात-पात पूछ रहे थे. मतलब साफ़ था ठगी का धंधा करने वाले उन सबका कुल-पुरोहित बनकर पैसे बनाने में लगे थे.
जाते ही सबसे पहले हर की पौड़ी गया. वहां सब ने अपने पाप धोने के लिये गंगा मे डुबकी लगायी. मुझे भी जबरन उस पानी में जाने के लिये मजबूर होना पड़ा. वैसे धूप तो सख्त थी लेकिन गंगा की धार तेज़ और उसका पनी उतन ही ठंडा. झूठा दिखावा करते हुए.. सबकी नज़रों से बच-बचाकर मैं कौआ-स्नान करके बाहर आया. एक बात तो थी. वहां का माहौल दर्शनीय था. उस मन्दिर में बसने वालों मे अपनी दिलचस्पी हो ना हो.. लेकिन उसके नाम में जो कला-कृतियां बन गयी वो क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी. एक तरफ़ शंकर की इतनी विशाल र ऊंची मूर्ति जितनी की खुद वहां की एक-दो पहाड़ें. छोटे बड़े कुल ७-८ एक रंग की मंदिरें. हरिद्वार की घाटें जो ऐसा लगता है बस स्नान के परपस सेही डिज़ाइन की गयी हों, वाक़ई अच्छी थी.
पुलिस का जत्था मानो तस्कीन कर रहा हो कि हम किसी को खतरे में नहीं पड़ने देंगे. सब के सब जवान, कम उमर वाले. दारोगा से लेकर सिपही तक. तैराकी दस्ता भी बिल्कुल मुस्तैद, मानो कह रह हो - लाख कोशिश कर लो, डूबने नहीं देंगे. पंडित रह-रह कर माइक पर चिल्ला रहा है - साबुन लगाकर गंगा में ना उतरें, घाट पर खाना ना खायें, गंदगी ना फैलायें... वगैरह-वगैरह!!
यहां से अब हम निकल पड़े - मनसा देवी की ओर... चढाई ही चढाई.. खतम होने का नाम ही ना ले.. और वो भी सीढियां!! पहाड़ हो सीधा तो मज़ा भी आये.. एक बात मुझे समझ नहीं आती.. किस उल्लू के पट्ठे ने ये साज़िश की. सारे के सारे दुर्गा रूप ऊंची पहाड़ी पर जाकर बसे हैं. चाहे हरिद्वार की मनसा या चंडी देवी हो या जम्मू की वैष्णो देवी. रूकते-बैठते-उठते-कसरत करते हम मनसा देवी के पास पहुंचे. १ घंटे से ज़्यादा लग गया उस चढ़ाई में. पर रास्ते में लंगूर और बंदरों की चुहलबाज़ियों ने अच्छा मनोरंजन किया. मेरे मन में रोपवे पर चढ़ने की बात जो चल रही थी वो ख़तम हो गयी चुंकि वो तकनीकी खराबियों की वजह से बन्द था. कमो-बेश यही कहानी चंडी देवी के साथ हुई और वहां का रोप-वे भी बंद ही था.
पहला दिन खतम हुआ पर दुर्भाग्य से हर की पौड़ी की महा-आरती छूट गयी सो सुबह-सुबह उठ कर जाना पड़ा. आरती यूं तो बेमानी थी लेकिन दृश्य अदभुत. लाखों या करोड़ों दीये गंगा में एक साथ प्रवाहित हो रहे थे. बड़े-बड़े थालों में आरतियां हो रही थी. चांद की परछाई गंगा में झिलमिला रही थी क्युंकि तब तक सूरज अपने रथ पर सवार नहीं हुआ था. इसके बाद हमने एक गाड़ी रिज़र्व की जो हमें ऋषिकेश घुमाने वाला था.
शान्ति कुंज, नीलकंठ, राम और लक्ष्मण झूला मेरे दिमाग में तो शायद वो जगह नहीं बना पया जो हरिद्वार से वहां तक जाने में इस्तेमाल किये रास्ते ने बनाया. पहाड़ों और जंगलों के बीच. हाथियों का गुच्छा, उनके गले में लगी टुनटुनाती घंटी, और उनको हांकता महावत दिल्ली शहर में भूले-भटके ही दिखते हैं. उपर वाली सड़क से नीचे वाली सड़क दिखती थी, और नीचे वाली सड़क से उपर वाली. ऐसा लग रहा था मानो एक ही जगह के चक्कर लगा रहे हों.
हरिद्वार की सैर कुछ मायनों मे मस्त रही तो कुछ मायनों में बेहद घटिया. करोड़ों आदमी का पागल की तरह भगवान का दर्शन करना जिसमें दुर्भाग्य से मेरे परिजन भी शामिल हैं, मुझे कचोटती रही. इसके साथ-साथ भारत जागृति मोर्चा का वो पोस्टर – “सर्व धर्म समान?” मुझे रास्ते भर हिलाता रहा. किताबें या पत्रिकाएं जो भी कहिये, बंट रही थी जिसमें से मेरे मां के हाथ भी एक लगी. और वो मुझे पढ़ा कर मानो हिन्दु धर्म की महत्ता को साबित करने का कोरा प्रयास करने में लगी थी. ये एक पत्रिका थी जो हिन्दु धर्म की महत्ता कम और बाक़ी धर्मों की ख़ामियां ज़्यादा गिना रही थी. मां को समझाने-बुझाने के बाद (जो कि मुश्किल है) दूसरे दिन, रात १२ बजे हरिद्वार से दिल्ली लौटने के लिये बस स्टैंड की तरफ़ निकला तो मेरा सामना सिर्फ़ उन्ही होर्डिंग से होता रहा – “सर्व धर्म समान?” और मेरे मुंह से हर बार गालियां निकलती रही – “सर्व धर्म – अधर्म.”
हरिद्वार.....अभी तक यहां जाना नहीं हुआ है. सोचा है लेकिन कभी जाने का मौका और हाथ में पैसे नहीं आए.
प्रत्युत्तर देंहटाएंपंडितों का प्रपंच तो हर जगह है. चाहे वो हरिद्वार हो या बैनाथधाम.
लेकिन आपने जिस तरह हरिद्वार के बारे में बताया ऐसा लगता है कि जल्दी जाना होगा.
कोशिश करूंगा कि अगले कुछ दिनों में दो चार दिनों के लिए जा सकूं.
रुड़की विश्वविद्यालय में पढ़ते वक़्त हरिद्वार जाने के दो मौके मिले थे। मनसा देवी तो मैं रोपवे पर चढ़कर ही गया था इसलिए सीढ़ियों की थकान का अनुभव नहीं हो पाया। घाट पर बेठना शांति देता है। अच्छा लगा आपका विवरण।
प्रत्युत्तर देंहटाएंहरिद्वार जाना मुझे बहुत प्रिय है. खासकर हर की पौड़ी पर बस शाम को यूँ ही बैठे दियों को बहते देखना और गंगा आरती का आनन्द लेना.
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छा लगा आपसे सुनकर.
भाई साहब हरिद्वार की यात्रा वृत्तांत आप से सुनकर दिल खुश हो गया |वैसे मैं पापी तो नहीं हूँ , लेकिन ऐसी जगहों को देखने की लालसा तो होती है | इस बार विश्विद्दालय की तरफ से शैक्षणिक भ्रमण जाने वाला था नौकरी के उहापोह में ये संभव नहीं हो पाया |आपसे इस यात्रा वृत्तांत को सुनकर ही दिल को दिलाशा दे रहा हूँ शायद कभी जा पाऊँ |
प्रत्युत्तर देंहटाएंsarv dharm adharm...correct
प्रत्युत्तर देंहटाएंhar dharm apni achchaiyan aur doosron ki buraiyan ginaata hai...aur phir prem ki baat karta hai...
aisi kai jagah hoti hain jahan jaane ka anubhav bahut touching hota hai...mujhe bhi mehroli aur nizzamuddin ki dargahein bahut pasand hain haalaki wahan bhi khoob dhakosle aur thagi hoti hai...har dharmik sthal ka yahi haal hai
bahut badhiya vartaant diya hai haridwar ka
प्रत्युत्तर देंहटाएं@फौजिया जी-यहाँ शायद मै आपसे सहमत नहीं हो सकता!कोई भी धर्म किसी को भी बुरा नहीं बताता!ये तो कुछ धार्मिक कहलवाने वाले खुद को,ऐसा करते रहते है!
प्रत्युत्तर देंहटाएं@अनभिज्ञ जी-हरिद्वार का अपना महत्व है हमारी संस्कृती में!मेरे या आप के कुछ भी कहने से वो तो बदल नहीं जाएगा!मुझे अपनी पीढ़ी के 4 पूर्वजो से अधिक नाम नहीं पता,और मै सनातन परम्परा या अति प्राचीन संस्कृती पर कैसे प्रशनचिंह लगा सकता हूँ?
आप की लेखनी सच में अद्भुत है!
आप ने यात्रा वृत्तांत का तो बहुत ही सिन्दार शब्द-चित्रण किया है!
कुंवर जी,