
मैं भेड़िया, गीदड़, कुत्ता जो भी कह लो, हूं. मुझे नोचना अच्छा लगता है. खसोटना अच्छा लगता है. मुझसे तुम्हारा मांसल शरीर बर्दाश्त नहीं होता. तुम्हारे उभरे हुए वक्ष.. देखकर मेरा खून रफ़्तार पकड़ लेता हूं. मैं कुत्ता हूं. तो क्या, अगर तुमने मुझे जनम दिया है. तो क्या, अगर तुम मुझे हर साल राखी बांधती हो. तो क्या, अगर तुम मेरी बेटी हो. तो क्या, अगर तुम मेरी बीबी हो. तुम चाहे जो भी हो मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरी क्या ग़लती है? घर में बहन की गदरायी जवानी देखता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. तो तुमपर अपनी हवस उतार लेता हूं. घोड़ा घास से दोस्ती करे, तो खायेगा क्या? मुझे तुमपर कोई रहम नहीं आता. कोई तरस नहीं आता. मैं भूखा हूं. या तो प्यार से लुट जाओ, या अपनी ताक़त से मैं लूट लूंगा.
वैसे भी तुम्हारी इतनी हिम्मत कहां कि मेरा प्रतिरोध कर सको. ना मेरे जैसी चौड़ी छाती है ना ही मुझ सी बलिष्ठ भुजायें. नाखून हैं तुम्हारे पास बड़े-बड़े, पर उससे तुम मेरा मुक़ाबला क्या खाक करोगे. उसमें तो तुम्हे नेल-पॉलिश लगाने से फ़ुरसत ही नहीं मिलती. कितने हज़ार सालों से हम मर्द तुमपर सवार होते आये हैं, क्या उखाड़ लिया तुमने हमारा? हर दिन हम तुम्हारी औक़ात बिस्तर पर बताते हैं. तुम चुपचाप लाश बनी अपनी औक़ात पर रोती या उसे ही अपनी किस्मत मान लेटी रहती हो. ताक़त तो दूर की बात है, तुममें तो हिम्मत भी नहीं है. हम तो शेर हैं. जंगल में हमे देख दूसरे जानवर कम से कम भागते तो हैं पर तुम तो हमेशा उपलब्ध हो. भागते भी नहीं. बस तैयार दिखते हो लुटने के लिये. कुछ एक जो भागते भी हो तो हमारे पंजों से नही बच पाते. पजों से बच भी गये तो सपनों से निकलकर कहां जाओगे.
पिछले साल तुम जैसी क़रीब बीस बाईस हज़ार औरतॊं का ब्लाउज़ नोचा हम मर्दों नें. तुम जैसे बीस बाईस हज़ार औरतों का अपहरण किया. अपहरण के बाद मुझे तो नहीं लगता हम कुत्तों, शेरों या गीदड़ों ने तुम्हे छोड़ा होगा. छोड़ना हमारे वश की बात नहीं. तुम्हारा मांस दूर से ही महकता है. कैसे छोड़ दूं. क़रीब अस्सी-पचासी ह़ज़ार तुम जैसी औरतों को घर में पीटा जाता है. हम पति, ससुर तो पीटते हैं ही, साथ में तुम्हारी जैसी एक और औरत को साथ मिला लिया है जिसे सास कहते हैं. और ध्यान रहे ये सरकारी रिपोर्ट है. तुम जैसी लाखों तो अपने तमीज़ और इज्ज़त का रोना रोते हो और एक रिपोर्ट तक फ़ाईल करवाने में तुम्हारी…. फट जाती है. तुम्हारे मां-बाप, भाई भी इज्ज़त की दुहाई देकर तुम्हे चुप करवाते हैं और कहते हैं सहो बेटी सहो. तुम्हारे लिये सही जुमला गढ़ा गया है, “नारी की सहनशक्ति बहुत ज़्यादा होती है.” तो फिर सहो.
मैं मर्द हूं और हज़ारों सालों से देखता आ रहा हूं कि तुम्हारी भीड़ सिर्फ़ एक ही काम के लिये इक्कठा हो सकती है. मंदिर पर सत्संग सुनने के लिये. तो क्या अगर तुम्हारा रामायण तुम्हे पतिव्रता होना सिखाता है. मर्दों के पीछे पीछे चलना सिखाता है. तो क्या, अगर तुम्हारी देवी सीता को अग्नि-परीक्षा देनी पड़ती है. तो क्या अगर तुम्हारी सीता को गर्भावस्था में जंगल छोड़ दिया जाता है. तो क्या अगर तुम्हारा कृष्ण नदी पर नहाती गोपियों के कपड़े चुराकर पेड़ पर छिपकर उनके नंगे बदन का मज़ा लेता है. तो क्या अगर तुम्हारी लक्ष्मी हमेशा विष्णु के चरणों में बैठी रहती है. तो क्या, अगर तुम्हारा ग्रंथ तुम्हारे मासिक-धर्म का रोना रो तुम्हे अपवित्र बता देता है. हम मर्द तुम्हें अक्सर ही रौंदते हैं. चाहे भगवान हो या इंसान, तुम हमेशा पिछलग्गू थे और रहोगे. तो क्या, अगर हरेक साल तुम तीन-चार लाख औरतों को हम तरह तरह से गाजर-मुली की तरह काटते रहते हैं. कभी बिस्तर पर, कभी सड़कों पर, कभी खेतों में. तुम्हारी भीड़ सत्संग के लिये ही जुटेगी पर हम मर्द के खिलाफ़ कभी नहीं जुट सकती.
तुम्हे शोषित किया जाता है क्युंकि तुम उसी लायक हो. मर्दों की पिछलग्गू हो. भले ही हमें जनमाती हो, पर तुम बलात्कार के लायक ही हो. तुम्हारी तमीज़ तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन और हमारा हितैषी है. जब तक इस तमीज़ को अपने दुपट्टे में बांध कर रखोगे, तब तक तुम्हारे दुपट्टे हम नोचते रहेंगे. जब तक लाज को करेजे में बसा कर रखोगे तब तक तुम्हारी धज्जियां उड़ेंगी. मैं भूखा हूं, तुम भोजन हो. तुम्हे खाकर पेट नहीं भरता, प्यास और बढ़ जाती है.
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wah saab wah
प्रत्युत्तर देंहटाएंander tak hila diya aapki post ne
सच! इतनी बेबाकी... तारीफ़ के लिए लफ़्ज़ नहीं हैं, हमारे पास...
प्रत्युत्तर देंहटाएंshabdo pe niyantran rakh ke bhi- sach kaha ja sakta hai
प्रत्युत्तर देंहटाएंगजब लिखा दिया यार, शुरू से अंत तक पढ़ते ही गए,
प्रत्युत्तर देंहटाएंराहुल जिस बिंदास तरीके से तुमने सच को लिखा है वो वाकई तारीफ़-के काबिल है...शुरु से अंत तक फ्लो में लिखा है...ऐसे ही लिखते रहिए...शुभकामनाएं
प्रत्युत्तर देंहटाएंउत्कृष्ट, उत्तम, बहुत ही बढ़िया, आपने एक बहुत ही बढ़िया विषय चुना है ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंमै आपको इस लेख के लिए बधाई देता हूँ । आपने अपने लेख में जो भी बातें कहीं हैं उनसे मै पूर्ण रूप से सहमत हूँ ।
अक्सर भीड़ में ऐसे कई कुत्ते व भेड़िए हम सभी को नज़र आते हैं, इन कुत्ते व भेड़ियों का मुख्य उद्देश्य सिर्फ़ भोजन व वासना होता है तथा सिर्फ़ इतने तक ही सीमित भी रहता है, इनका जीवन में कोई उद्देश्य नहीं होता ।
मुझे उन बहनों व माताओं पर दया है जिनको ऐसे हालातों से गुज़रना पड़ता है ।
आपके इस लेख में बहुत ऊर्जा है जो इंसानों में बदलाव लाने की क्षमता रखती है ।
आप साधुवाद के पात्र हैं । मुझे आशा है कि आप इसी तरह से दूसरे विषयों पर भी लिखते रहेंगे ।
भविष्य के लिए शुभकामनाएँ ।
bahut hi badhiya likha hai.
प्रत्युत्तर देंहटाएंjab bhi kisi mahila mitr ke saath sadak se gujarat hun to meri bebas aakhen un bhediyon ko hi niharti hain jinkee aankhe keval aankhe nahi rahti.
is tarha ke log kisi ek parivesh ya kisi ek class me nahi hain.
I hope women will stop living like sheep one day.
प्रत्युत्तर देंहटाएंWonderful post !
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प्रत्युत्तर देंहटाएं.
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प्रिय राहुल,
हिला के रख दिया यार... तुम्हारी बेबाकी को सलाम...
आभार!
photo dekh kar dar laga magar pad kar acha laga
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक कटु सत्य को वस्त्रहीन कर दिया…………………और शायद सही किया………………सामाजिक चेतना और जन जागृति के लिये आज ऐसे ही अभियानों की जरूरत है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंस्त्रियों को जागरूक करने वाली उत्तम रचना....सत्य को बेबाकी से लिखा है....काश हर स्त्री ये लेख पढ़े और मंथन करे....
प्रत्युत्तर देंहटाएंक्या कहूं स्तब्ध हूं , पहले प्रोफ़ाईल पर आपके परिचय ने प्रभावित किया फ़िर रही सही कसर इस लेख ने पूरी कर दी । कलम आग भी उगल सकते हैं आज पता चला । जाने क्यों वर्ष की अच्छी पोस्टें सहेज रहा हूं , और उनमें भी आज आपको सहेजते हुए मुझे बहुत ही गर्व की अनुभूति हुई ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस देश और इन्सान के अन्दर के भेडिये का सत्यमेव जयते के आधार पर वर्णन सराहनीय है / लेकिन इन्सान के अन्दर हैवान का परिचय करा, उसके नियंत्रण का उपाय नहीं बताना ठीक नहीं / दरअसल इन्सान इस हैवानी प्रविर्ती का शिकार तब ज्यादा होता है जब वह अपने अन्दर के जमीर की नहीं सुनता है / आज ज्यादातर लोग इसके शिकार हैं /आशा है आप इसी तरह ब्लॉग की सार्थकता को बढ़ाने का काम आगे भी ,अपनी अच्छी सोच के साथ करते रहेंगे / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /
प्रत्युत्तर देंहटाएंapni kalam ki dhaar tez karne, aise lekh likhne aur padhne ka tabhi faayeda hai jab inhe padh kar soch me kuchh badlaav aaye...sahi maayno me tabhi aise lekho ki safalta hai...aur jaha tak main sochti hu.....kuchh to log jagenge...aur un logo me male/female sabhi aate hai..shayed iski safalta kuch percentage ka aankda paa chuki hogi. shubhaasheesh/shubh kaamnaye.
प्रत्युत्तर देंहटाएंजबरदस्त हिला देने वाला लेखन....
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut achhe...jo tum kehte ho mehsoos karte ho tumhare lafzon se saaf nazar aata hai, behad teekha likha hai, ye padh kae jhurjhuri si mehsoos ho rahi hai...
प्रत्युत्तर देंहटाएंkeep it up
hello... hapi blogging... have a nice day! just visiting here....
प्रत्युत्तर देंहटाएंjabardast wali baat hai ji sach me!bahut khoob keh kar pta nahi mai kisi ki badai kar raha hu ya khud ko sharmshaar!par bahut khoob!
प्रत्युत्तर देंहटाएंkunwar ji,
मैंने आज आपके इसके ऊपर के सभी लेख पड़े हैं . आप कितना मार्मिक और सटीक लिखते हैं ..!
प्रत्युत्तर देंहटाएंयह लेख तो दबे लिपे कठोर सत्य को हठात उघाड़ने वाला है जो अन्दर तक झकझोरता है ..हमारी तथाकथित सभ्य और संस्कृत सभ्यता की हकीकत उजागर करता है .