
जो मरने के लिये ही आया है उसे मौत की सज़ा सुनाकर हम कौन सा तीर मार लेंगे. वो तो ग़नीमत है कि कसाब २६/११ को बच गया वरना वो कौन सा वापस पाकिस्तान लौट के हनीमून मनाने वाला था ! फ़ांसी की सज़ा सही मायनों में न तो कसाब जैसे अपराधियों में दहशत ही बना पायेगी, न ही इससे आतंकवाद की घटनायें कम होने लगेगी. उसे तो सारी उमर जेल में रखकर पत्थर तुड़वाये जाने चाहिये थे. बल्कि मेरा निजी राय तो ये है कि उससे सारी उमर जेल में बाक़ी क़ैदियों का जूठा बरतन साफ़ करवाना चाहिये. ऐसा होता तो लगता सज़ा मिली है. अभी तो लगता है जैसे कसाब की मुराद पूरी हुई हो. उसने तो बिल्कुल शुरुआत में ही अपना ज़ुर्म क़ुबूल कर लिया था यह जानते हुए भी कि इसका नतीज़ा सज़ा-ए-मौत हो सकती है. मतलब उसे न तो इसका डर था न ही फ़िकर. उसका मक़सद पूरा हो चुका था. ये सज़ा तो… लगता है सज़ा नहीं सुविधा है.
भारत के वकीलों, सुरक्षा सलाहकारों और यहां की बहुत बड़ी आबादी का मानना है कि डेथ-सेंटेंस को जश्न के रूप में मनाना चाहिये. मेरा सीधा सवाल है – क्यों? कैसा जश्न जब हम एक अपराधी को उसके मक़सद की ओर भेजने में उसकी मदद कर रहे हैं. वो मरने के लिये आया है और हम उसे मार रहे हैं. वाह भई वाह!! मज़ा तो तब आता जब ’वांटेड’ सनीमा के उस डॉन की तरह इसे भी लगातार जगाया रखा जाता. उसके मरने की चाहत के खिलाफ़ हमें कसाब का हिसाब ज़िंदगी भर के नौकरपनी से करवानी चाहिये था.
कुछ लोगों पे तो बड़ी हंसी आती है. वो कहते हैं कि अगर इसे ज़िंदा रखा तो फिर कोई प्लेन हाईजैक करवा के इसे छुड़ा ले जायेगा. अजीब बात है. अपनी सुरक्षा पे भरोसा नहीं इसलिये फांसी पर चढ़ा दो. खैर अभी तो बहुत वक़्त है कसाब के पास.
आपकी बात से देश की आम जनता को सहमति और असहमति दोनों हो सकती है जो पीड़ित है |वो चाहते है कि उनके दिल को थंधक तभी मिलेगी जब कसाब को फांसी मिलेगी | लेकिन प्रबुद्ध जन एक अलग राय लेकर बैठे है | बढियां आलेख
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपका अनुज गौतम
--
मौत की सजा के खिलाफ तो मै भी हूं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंलेकिन कसाब के लिए सजा तय करते समय यह नहीं सोच पा रहा हूं.
मौत की सजा के खिलाफ हूँ । आपके दिये गये तर्कों से भी सहमत हूँ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंहां आदमी के साथ कुछ भी करने के लिये उसका जिन्दा रहना तो जरूरी है। पर कसाब की ही बात नहीं वो जिन्दा लोग भी कितने जिन्दा हैं- जो भ्रष्टाचार में डूबे हैं, अपने दिमाग से सोचते नहीं लोगों की बताई बातें ही दोहराते और अंजाम देते हैं, गुरू शिष्य बने बैठे हैं, तरह तरह के भगवान बनाये हुए हैं.....
प्रत्युत्तर देंहटाएंमौत की सज़ा उसके लिए सुविधा ही तो है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंराहुल बहुत सही कहा तुमने...और इतना पैसा सुरक्षा पर खर्च करके भी ये डर...लानत है...