बृहस्पतिवार, 27 मई 2010

शांत, शिथिल और अमिट चेहरे

बेगुसराय में किराये के मकान में रहते थे हम. न्यू दिनकर नगर प्रोफेसर्स कॉलोनी में. लाल पगड़ी बांधे आता था वो. चमकती हुई सफ़ेद मूछ और दाढ़ी में लिपटा था उसका चेहरा. एक हाथ में पीतल की कमंडल होती थी. दूसरे में लाठी. साल दर साल बीते. सिवाय चंद झुर्रियों के उसके चेहरे में कुछ और बदला नहीं उन आठ-दस सालों में. उसके मुंह से सिर्फ़ एक ही रट सुनायी देती थी – ’शंभू-शंभू’. उसका नाम मुझे नहीं पता था. दाल, चावल, आटा, रोटी, आलू कुछ भी दे दो उसे. खुशी से निकलते थे उसके पीले दांत, सफ़ेद दाढी और मूछों के बीच से. थोड़ा सा सफ़ेद होता दांत तो शायद फ़रक़ ही नहीं कर पाते कि दांत है या दाढ़ी. उसका आशीर्वाद भी लगता था रटा-रटाया सा – “लक्ष्मी मिले, धन मिले, विद्या मिले, बुद्धि मिले, बाल-बच्चा पढ़ लिख-कर कलेक्टर बने.” जिस दिन ’शंभू-शंभू’ की आवाज़ कानों के दरवाज़े नहीं खटखटाती, लगता था कुछ छूट रहा है. उसके चेहरे पे हमेशा एक ही भाव होता था. कोई बदलाव नहीं. चाहे आप कुछ दें या न दें. बाबा कहके उनकी इज़्ज़त करें, या उनको गरिया लें. वो बस मुस्कुराते ही रहते थे. वो मुस्कुराहट या तो फ़ेक थी या फिर फ़ेवीकॉल से चिपका दी गयी थी उसके चेहरे पर. अगर मैं एक अच्छा चित्रकार होता तो उसकी तस्वीर ज़रूर उकेड़ देता क़ागज़ पर.

मुनिरका से बाहर निकलने के लिये अनुपम रेस्तरां की तरफ़ आता हूं. वहां एक औरत अपने बोरिया-बिस्तर के साथ मिलती है २४ गुना ७. दिखने में वो भद्दी है. उसके बाल बिल्कुल उलझे हैं. उजले और सफ़ेद बाल आपस में मिल्कर ग्रे हो गये हैं. वो काली है. मोटी है. उसकी आंखे बिल्कुल सूखी है, निष्क्रिय हो जैसे. भावशून्य. वो हर रात उस दुकान के नीचे बनी सीढियों पे सोती है जिसके शटर पर वोडाफ़ोन का लोगो पुता है. और दिन में जैसे ही दुकान खुलने का वक़्त होता है.. अपना सारा बिस्तर सड़क के दूसरे किनारे पर लगा लेती है. जब भी गुज़रता हूं नज़रे दौड़ती है पहले शटर के नीचे और उसे वहां न पाकर सड़क के दूसरे किनारे. उसकी मांग में सिंदूर भी है. उसके हाथों में चूड़ियां भी हैं. पर कहां है उसका परिवार, पति और उसके बच्चे? मैनें उसे कभी खाते हुए नहीं देखा न ही उससे खाने को कभी पूछा. उसके पास एक पानी की बोतल ज़रूर है जिससे वो कभी अपना चेहरा धोती है, कभी प्यास बुझाती है.

ऑफ़िस के बाहर एक छोटी सी मार्केट है. निकल के हमेशा जाता हूं वहां सुट्टा लगाने के लिये. वहां एक औरत है जो शायद मानसिक विकलांगता का शिकार है. गरमी हो या जाड़ा उसके तन पर एक मोटा ऊनी का शॉल ज़रूर होगा. उसकी साड़ी घुटनो तक ही होती है. पैर नंगे हैं. उसकी सरहद शायद इसी छोटे से मार्केट तक सिमटी हुई है. मैनें जब भी देखा है वो इसी मार्केट के अहाते में या तो चक्कर लगाते दिखी है, या कबूतरों के साथ बैठी दिखी है. कबूतर दाना चुग रहा है, वो उसे टुकुर-टुकुर देख रही है. वो कुछ लोगों को पुकारती है. उनसे टाइम पूछती है. फिर पता नहीं क्या बतियाती है. उसकी बातें मेरी समझ में नहीं आती. उसके बाल औरतों के टाइप की नहीं है. ऐसा लगता है किसी ने कैंची लेकर छपट दिया है ऐसे ही. उसके गाल हड्डियों से चिपके हुए हैं. दांत थोड़ा सा बाहर है. पर भावशून्यता यहां भी है. मैं क़रीब छह महीने से यहां हूं. मुझे उसके हुलिये में कोई बदलाव नहीं नज़र आया. हाथों में प्लास्टिक की थैली को वो अपने पास ऐसे रखती है जैसे जीवन की अरजी हुई सारी कमायी उसके अंदर हो. जब भी बाहर निकलता हूं तो एक बार नज़र दौड़ ही जाती है उधर उसे ढूंढने को.

कुछ चेहरे पत्थर की लक़ीरें होती है. शांत, शिथिल और अमिट. कितना भी चाहो ज़ेहन से मिटती नहीं. उनसे कोई जान-पहचान नहीं होती. कोई परिचय नहीं होता. पर जब भी उस रास्ते से गुज़रें तो आंखे ढूंढने लगती है वो चेहरा. ऐसे कई चेहरे शायद आप भी याद करने लगे इसको पढ़ने के बाद…

6 comments:

  1. Aisa hi ek chehra mere zehen me bhi aa raha ha...
    sahi kaha tumne kuch chehre aise hote ha jinse koi jan pehchan nhi hoti fir bhi...fir bhi na jane kyu vo hamare zehen me bas jate ha...

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  3. पढने कि शुरुआत में मुझे लगा कि ये बातें भला मेरे किस काम की है...लेकिन आपने जो प्रवाह बनाया उसने पढना बंद करने ही नहीं दिया...मुझे अवसर ही नहीं मिला पढना बंद करने का और लेख पूरा हो गया.....और अन्त में जो आपने लिखा.....सच में बिलकुल सही था....और मै क्यों पढ़े जा रहा था ....अब समझ आ रहा था.....

    आपके शब्द-चित्र,आपकी छोटी-छोटी बातो की व्यांख्या...वाह...

    कुंवर जी,

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  4. mere ghar ke paas kai saal se ek fakeer aata hai, bahut achhi aawaz hai uski kuch gata hai...tumhara article padh kar us fakeer ka hi kuch gaya hua sunne ka man ho raha hai...

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  5. आपके चहरे दिखाने और उनके पीछे के अव्यक्त सरोकारों ने आशवस्त किया। और पुरानी कुछ पोस्ट पढ़ने के बाद यह और पुख़्ता हुआ। यह अंदाज़ दिमाग़ को झकझोर देने वाला है।

    शुक्रिया।

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  6. acchi lagi, wastwikta ko apne acche se bayan kiya hai. kash yah mauka hame nahi milta lekin yahi to durbhagya hai. bihar waali baba waali khabar padhkar maza aaya to dusre ne ek had tak sochne per vivash kiya. mishran accha raha.

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