बृहस्पतिवार, 27 मई 2010

इंसान कैसे रंग में... लिपा-पुता सा है



रोड़ा-पत्थर सा यहां बिखरा पड़ा सा है,
हाथ कुछ और पैर... कुचला दबा सा है,

ख़ून का छींटा कहीं और अश्क की दरिया,
परिजन किसी का लाश से लिपटा हुआ सा है,

है कौन हिन्दू, और मुस्लिम, ढूंढ के बतला,
अल्लाह तेरा और राम भी... दुबका-छुपा सा है,

जिहाद या फ़साद है, है राम या हराम है,
इंसान कैसे रंग में... लिपा-पुता सा है,

एक मुल्क मुल्कों से भरा, है सरहदों में सरहदें,
दोस्त तेरा देश कितना….. बंटा-बंटा सा है...

2 comments:

  1. सही कहा , पर इंसान कहा मानने वाला है

    religion is the opium of MASS

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  2. बहुत सुन्दर रचना ... और दिल को छुन लेने वाली भावनाएं ...तथाकथित धर्म ने तो हमारे देश का सत्यानाश कर दिया है !

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