
आज यहां सब विराजमान हैं. राधा, कृष्ण, राम, जानकी, लक्ष्मण, हनुमान (एक छोटा हनुमान राम के चरणों में, एक बड़ा हनुमान पहाड़ और गदा लिये अकेला), और कैलाशपति भोलेनाथ. अकेले भोलेनाथ को सबसे ज़्यादा ज़मीन दी गयी है, हड़प कर. शिव जी, बजरंगबली और श्रीराम अपने परिवार सहित नजाने कब से इस सरकारी स्कूल के आगे सड़क बनाने के लिये आबंटित ज़मीन पर जमे हुए हैं. ये ज़मीन जहां तक मेरा अनुमान है स्टेट बोरिंग की ज़मीन थी जहां शायद बाद में सड़क बनती.
खैर, जब मैं यहां बसा था उस वक्त ये मंदिर अस्तित्व में थे लेकिन प्रेम-प्रतीक राधे-कृष्ण का घर मेरे बाद बना था. या यूं कहें कि लगभग साथ-साथ बना था. फ़र्क़ बस इतना था कि मेरे बाबू जी को ज़मीन ख़रीदने और घर बनाने में लाखों रुपये लग गये और कृष्ण अपने लिव इन पार्टनर के साथ बिल्कुल मुफ़्त में आकर बसे. जितनी सरल और प्यारी मुस्कान इन तमाम प्रतिमाऒं के चेहरे पर बिखरी हुई है उससे भी ज़्यादा कुटिल चालों से इंसान इन्हें यहां बसा गया.
बेगुसराय ज़िले में है बरौनी रिफ़ायनरी, टाउनशिप. इसके पूर्वी दिशा में एक गांव है, इटवा. इटवा के बाद पिपरा. और पिपरा के बाद न्यू दिनकर नगर प्रोफेसर्स कॉलोनी. ये तीनों जगह टाउनशिप के पूर्वी बाउंड्री वॉल के साथ साथ लगी हुई है. बाउंड्री से सटी हुई गांव की तरफ़ की क़रीब १८ फ़ीट ज़मीन पर चल रह विवाद थम चुका था और रिफ़ायनरी ने ये केस जीत लिया था. कुछ लोग खुश थे कि रिफ़ायनरी ये ज़मीन कब्ज़े में करेगी तो अच्छा ही होगा, कम से कम लाइट लग जायेगी तो लोग रात को डरेंगे नहीं. छोटे मोटे छीन-छोड़ की घटना कम होगी. लेकिन यहां पर बसे दो-चार दबंगों के लिये दिक्कत की बात यह थी कि अगर उस ज़मीन पर रिफ़ायनरी ने अपना कब्ज़ा कर लिया तो वो गाय कहां बांधेंगे! गोबर कहां जमा करेंगे! गोयठा कहां ठुकवायेंगे! छोटी-मोटी सब्जियां कहां उगायेंगे! जहां सब कुछ फ़्री में मिल रहा है वहां अपनी ज़मीन का इस्तेमाल किया तो कट्ठा-दो कट्ठा तो लग ही जायेगा.
उस सुबह जब सायकल लेकर बाजार की ओर निकला तो पिपरा में वहां एक झोपड़ बना था जिसमें पत्थर के कुछ टुकड़े पड़े थे. कुछ लोग अगरबत्ती लेकर पूजा-पाठ भी कर रहे थे. बाजार जाने के लिये मुझे हमेशा उसी रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ता है. जब शाम को दोबारा उधर से गया तो देखा कि वहां पर ईंट, छड़, बालू, गिट्टी, सीमेंट ज़मा किये जा रहे हैं. उधर से जितने भी ट्रैक्टर जाते उसे रोककर, ड्राइवर को ज़बरदस्ती डरा धमकाकर, और जहां बात न बने वहां लपड़ाकर ये चीज़ें जुटायी गयी थी. पत्थर के उन टुकड़ों के चारो ओर रातो-रात पीलर ढाल दिये गये. छत की ढलायी हो गयी. सुबह जब निकला तो देखा कि ईंट जुड़ायी का काम चल रहा है. इतनी तेज़ गति से किसी काम को देखने का यह मेरा पहला अनुभव था. २४ घंटे के अंदर रिफ़ायनरी की ज़मीन पर एक ऐसा ढांचा तैयार था जिसे तोड़ने के नाम पर ही मार-काट शुरु हो जाती है. मंदिर बनकर तैयार हो गया. अब दूर-दूर तक उपवन लगने लगे. मंदिर दिनो-दिन अपना दायरा बढ़ा रहा है. पत्थर के टुकड़े मुर्तियों से रीप्लेस कर दिये गये हैं. मिट्टी की ज़मीन मार्बल में बदल दी गयी. सीमेंटेड दीवारें टाइल्स से चमचमाने लगी.
मेरी मां हर साल अलग-अलग मौसम में वहां बसे सारे भगवान को कपड़े सिलकर देती है. ठंड के मौसम में उनके लिये कश्मीरी शॉल, गरमी में मलमल का कुर्ता और ए-ग्रेड की पीतांबरी सिली जाती है. ये बात और है कि हर साल उसी गांव में कितने बूढे ठंड से ठिठुरकर मरते हैं. उसी गांव में दलितों के बच्चे को आज भी मां की गाली से ही संबोधित किया जाता है. उसी गांव में कितने लोग उस टाट के नीचे सोते हैं जहां धूप में सूरज घुस जाता है और बारिश में टप-टप करता हुआ पानी वहां रहने वालों को सताता है. काश ट्रैक्टर वालों को डरा-धमकाकर ईंट और छड़ छीनने वाले तथाकथित दबंग इनलोगों के लिये अधार्मिक शैली में ही सही एक डिस्को छप्पर भी लगवा देते तो आज मेरी कलम उन्हें ग़लत न ठहराती.
पिपरा से भी ज़्यादा कुराफ़ात तो ईटवा के उस इलाक़े में हुआ है जिसे गांववालों ने जगदेव बाबा के नाम पर हड़प कर रखा है. ये क़रीब २-३ कट्ठा ज़मीन है जिसमें मालदह आम के क़रीब १०-१५ पेड़ लगे हुए हैं. ये ज़मीन भी रिफ़ायनरी की है. यहां पे जब जब रिफ़ायनरी वाले अपनी बाउंड्री खड़ी करते हैं, गांव वाले चौकीदार को कुछ पैसे देकर ढाह देते हैं और कहानी मढी जाती है कि फ़लां-फ़लां बाबा को घेरने पर रिफ़ायनरी की बाउंड्री अपनेआप ढह गयी. ५-६ कोशिशों के बाद अब रिफ़ायनरी ने भी उकता कर छोड़ दिया है. कुछ लोगों की ऐश हो गयी है. उसी बाबा के पड़ोस में और आम के पेड़ की छांव में तशेरियों का अड्डा बना हुआ है. भूसे का कारोबार और गिट्टी, बालू का कारोबार भी रिफ़ायनरी की ज़मीन पर धड़ल्ले से चलायी जा रही है. और जगदेव बाबा इन सबको प्रश्रय दे रहे हैं.
एक बात साफ़ कर दूं. मैं रिफ़ायनरी का हितैषी नहीं हूं न ही गांव वालों से मेरी दुश्मनी है. रिफ़ायनरी बेगुसराय में बहुत धुआं फैलाती है. लेकिन उसने बहुत सारे पेड़ भी लगाये हैं. बहुत लोग वहां मज़दूरी कर अपना पेट भी पालते हैं. रिफ़ायनरी का सायरन मक्सिम गोर्की के द्वारा लिखे ’मां’ की याद दिला जाता है. लेकिन रिफ़ायनरी मज़दूरों के साथ कम से कम वैसा व्यवहार नहीं करती जैसा मिल-मालिकों का इतिहास रहा है. गांव के दबंग भुमिहार या पंडित जो भले ही बहुत पैसे वाले न हों लेकिन उनके शोषण का तरीका और भी अमर्यादित और शर्मसार कर देने वाला है. वो भगवान के लिये ढांचे खड़े करवाने वक्त तो डोम और मुसहर से भी ईंट ढुलवायेंगे लेकिन बाद में उन्हीं को मंदिर में पैर रखने से रोक देंगे. वो यज्ञ करवाने के लिये चंदे तो वहां से ज़रूर लेंगे लेकिन अगर उस यज्ञ का कलश कोई दलित उठाना चाहे तो मार-पीट कर उसे रोक देंगे.
rahul...galat ko galat khulkar kehna tumhara andaz ha...vhi bindas style...bohot khoob likha ha...keep it up...
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं एक बात कहना चाहता हूँ कि जब से तुम्हारे ब्लॉग को देखना शुरू किया है तब से तुम्हारी नई पोस्ट का इंतज़ार रहता है....बहुत अच्छा लिखते हो....
प्रत्युत्तर देंहटाएंये खूब है....आज यहां सब विराजमान हैं. राधा, कृष्ण, राम, जानकी, लक्ष्मण, हनुमान (एक छोटा हनुमान राम के चरणों में, एक बड़ा हनुमान पहाड़ और गदा लिये अकेला), और कैलाशपति भोलेनाथ. अकेले भोलेनाथ को सबसे ज़्यादा ज़मीन दी गयी है, हड़प कर. शिव जी, बजरंगबली और श्रीराम अपने परिवार सहित नजाने कब से इस सरकारी स्कूल के आगे सड़क बनाने के लिये आबंटित ज़मीन पर जमे हुए हैं।
और ये तो और भी ज़्यादा....फ़र्क़ बस इतना था कि मेरे बाबू जी को ज़मीन ख़रीदने और घर बनाने में लाखों रुपये लग गये और कृष्ण अपने लिव इन पार्टनर के साथ बिल्कुल मुफ़्त में आकर बसे..
तुम्हारे लिये शुभकामनायें....
Ab koi mandir ko gaali de to musalmaan ki Taaref to mil hi jati hai , Kai baar note aur vote bhi mil jaate hain . Par koi masjid ko gaali de to hindu na not denge na vote denge , Haan musalmaan chot jarur denge .
प्रत्युत्तर देंहटाएंTo guus and Gals , it is always safe and easy to curse hidu temples . Keep doing it :)
सीधी भाषा में सही बात कही है, और यही वक्त की जरूरत है। आज समाज में फैली हर प्रकार की बुराई के साथ धर्म की सांठ-गांठ है और इसे बेनकाब करना जरूरी है। धर्म की सच्चाई को अनावृत किए बिना कोई सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut khub
प्रत्युत्तर देंहटाएंसाथियो, आभार !!
प्रत्युत्तर देंहटाएंआप अब लोक के स्वर हमज़बान[http://hamzabaan.feedcluster.com/] के /की सदस्य हो चुके/चुकी हैं.आप अपने ब्लॉग में इसका लिंक जोड़ कर सहयोग करें और ताज़े पोस्ट की झलक भी पायें.आप एम्बेड इन माय साईट आप्शन में जाकर ऐसा कर सकते/सकती हैं.हमें ख़ुशी होगी.
स्नेहिल
आपका
शहरोज़
The wors with the truthness reveal the agony for theperson who calls oneself secular .ur writing is fine well thought and penetrating .
प्रत्युत्तर देंहटाएंGautam sachdev
bahut achhe rahul...tumhe hazaar baar keh chuki hun aur kehti rahungi...kya khoob likhte ho yaar
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