
ये है भारत की भयावह तस्वीर. हर तीन में से एक औरत अपने 15 से 49 वर्ष तक की अवस्था में होती है यौन उत्पीड़न या शारीरिक शोषण का शिकार. हर सात में से एक शादीशुदा औरत होती है पति के हाथो हिंसा का शिकार. हर रोज़ भारत में होता है औसत से सात हज़ार लड़कियों का जन्म. एक हालिया सर्वे के मुताबिक दिल्ली के मूलचंद अस्पताल में 2005-2007 में हज़ार लड़कों की तुलना में हुआ महज 514 लड़कियों का जन्म. आंकड़ा सरकारी होने पर इतना भयावह है तो असलियत होगी कितनी अमानवीय!!
नेशनल क्राईम ब्यूरो की रिपोर्ट बतलाती है कि साल 2008 में भारत में महिलाओं के उपर हुए ज़ुल्म के क़रीब दो लाख मामले दर्ज हुए. मामला बलात्कार, दहेज के लिये की गयी हत्या, घरेलू हिंसा वगैरह-वगैरह से संबद्ध था. केवल बलात्कार के बीस हज़ार मामले ऐसे थे जिसमें बलात्कारी अपना ही कोई सगा-संबंधी था. मसलन चाचा, मामा, फूफा, भाई, बाप. इन आंकड़ों में ढाई हज़ार ऐसे मामले दर्ज़ हैं जिसमें 15 वर्ष से कम उमर की बच्चियों का बलात्कार हुआ है जिन्हें असल में बलात्कार का मतलब भी पता नहीं होगा. क्या उन हरामियों को उस बच्ची की चीख में अपनी किसी बहन या बेटी का चेहरा नहीं दिखा!!
बड़े शहरों के बारे में यह आम धारणा होती है कि वहां की स्थिति छोटे शहरों और गांवों से बेहतर होगी लेकिन महिलाओं पर हो रहे अपराधों में इस तरह की धारणा पालना बहुत बड़ी बेवक़ूफ़ी है. भारत की आबादी क़रीब एक अरब 15 करोड़ है जिसमें दस करोड़ लोग महानगर से आते हैं. अकेले 2008 में देश भर से आये क़रीब दो लाख मामलों का दस फ़ीसदी बड़े शहरों से आये हैं. सरकारी रिपोर्ट तो बस वैसे मामलों का ब्योरा है जो थाने की दहलीज़ तक पहुंच पाते हैम वरना लाखों तो घर की चौखट पर ही दम तोड़ देते हैं.
विकास और व्यवहारिकता को सीधे-सीधे अशिक्षा से जोड़ देने का बहाना भी निरुपमा की मौत के साथ खत्म हो गया. उसके परिवार में न तो कोई अशिक्षित था न ही वो पिछड़े लोगों में से थे. ऑनर किलिंग का मामला अब सिर्फ़ किसी पिछड़े गांव या तबके से नहीं बल्कि शहरों से भी आता है. अभी कुछ दिन पहले ही तो दिल्ली में तीन घंटे में तीन हत्यायें सिर्फ़ इसी वजह से हुई. और तो और बाप अपनी बेटी के क़ातिल यानी कि अपने हत्यारे बेटे का बढ़-चढ़ कर पक्ष ले रहा है. जब तक ऐसे हरामी बाप-भाई हैं तब तक कोई औरतों के आगे बढ़ने का कोई दिवा स्वप्न भला देखे भी तो कैसे!! याद रहे.. ये उसी हिन्दू धर्म की दुहाई देते हैं जिसका कृष्ण रुकमिणि को भगाकर कर शादी करता है, जिसकी कुन्ती बिन ब्याहे कर्ण जैसे शूरवीर को जन्म देती है, जिसका हनुमान खुद को कह्ता तो ब्रहमचारी है पर एक बेटे का बाप है, जिसका लक्षमण बेवजह शूर्पनखा का नाक काट देता है. असल में भारतीय समाज हमेशा से ही स्त्री-विरोधी और घोर पुरुषवादी रहा है फिर चाहे वो हिन्दू हो, मुस्लिम हो, सिख हो या इसाई हो. सारे नियम, सारे क़ायदों का बोझ निरुपमा या उस जैसी हज़ारों-लाखों लड़कियां ही क्यों ढोये?
लैंगिक भेदभाव को लेकर 165 देशों पर रिसर्च हुआ और भारत को 115 वां स्थान मिला. संयुक्त राष्ट्र ने शिशु और मातृत्व सुरक्षा पर एक रिपोर्ट ज़ारी की है. इस अध्ययन के अनुसार 77 मध्य आय वालों देशों में इस समय भारत का स्थान 73 वां है. दुनिया भर के जिन बारह देशों में गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं, और नवजात शिशुओं की मौत सबसे ज़्यादा होती है, भारत उनमें से एक है. यानी कि जिस संस्कृति के धनी देश भारत में महिला को देवी का दर्ज़ा दिया गया है वही देश मां बनने के लिये सुरक्षित नहीं है.
दिल्ली, मुंबई या बैंगलोर जैसे महानगरों में किसी मल्टी नेशनल कंपनी के बड़े फाटक से निकलती हुई अकोर्ड की चमचमाती हुई गाड़ी और उसके स्टेयरिंग को थामे हाथ जब किसी लड़की के होते हैं तो लगता है हिन्दुस्तान बदल रहा है. इंडिया गेट की सड़क पर सुबह सुबह बुलेट चलाती कोई लड़की हवा से बात करते हुए जब बगल से निकलती है तो लगता है हिन्दुस्तान बदल रहा है. पर ये असल में फटी हुई किताब में लपेटी हुई नयी जिल्द भर है. भारत में सात से चौदह वर्ष तक के ऐसे बच्चों की कुल आबादी क़रीब पांच करोड़ है जिनका किसी स्कूल में नामांकन नहीं होता. इनमें पचपन प्रतिशत लड़कियां हैं. बीते एक अप्रैल से बहाल ’राईट टू एजूकेशन’ किस काम का रह जायेगा अगर ऐसी करोड़ों लड़कियां किसी स्कूल तक पहुंच ही न पायें?
’नेशनल कमीशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चिलड्रन्स राईट्स’ की एक रिपोर्ट बतलाती है कि भारत में छ से चौदह साल तक की ज़्यादातर लड़कियों को हर रोज़ औसतन आठ घंटे से भी ज़्यादा समय केवल अपने घर के कामों में बिताना पड़ता है. मसलन झाड़ू-पोंछा, छोटे बच्चों को संभालना, खाना पकाना वगैरह वगैरह. सरकारी आंकड़ों को लेकर ही आगे बढ़ें तो जहां छ से दस साल तक की 25 प्रतिशत लड़कियां स्कूल से ड्रॉप-आऊट होती हैम वहीं दस से तेरह साल की लगभग पचास प्रतिशत लड़कियों को पढ़ाई के दौरान स्कूल छोड़ना पड़ता है. साल 2008 में कराये गये एक सरकारी सर्वेक्षण में 42% लड़कियों ने बताया कि उन्हें स्कूल अपने मां-बाप के दबाव की वजह से छोड़ना पड़ता है ताकि वो घर का काम-काज संभाल सकें.
भारत में महिलाओं की संख्या कुल आबादी का 48.26% है. इनमें से 44.2% महिलाऒम को वोटाधिकार प्राप्त है. इतनी बड़ी वोटिंग आबादी के बावुजूद भी लोकसभा में सिर्फ़ 9.2% महिला प्रतिनिधि हैं, जबकि राज्यसभा में इनका प्रतिशत महज 8.6% है. इसको विडंबना ही कहेंगे कि भारत के कुल 32 केंद्रीय मंत्रालयों में सिर्फ़ दो ही महिला के हाथों में है. ममता बनर्जी के हाथ में रेल है और अंबिका सोनी संभालती है सूचना और प्रसारन मंत्रालय. इनके अलावा छ महिलायें राज्य मंत्रालय संभालती हैं. बस. लोकसभा की कुल 542 सीटों में महिलाऒं की हिस्सेदारी महज 42 सीटों पर है. राज्यसभा के 242 सीटो में सिर्फ़ 28 स्त्रियां हैं. संसद में महिलाओं के लिये जो 33% आरक्षण का हो-हल्ला आंधी की तरह राज्यसभा से पास होकर गुज़रा तो पर लोकसभा तक कब पहुंचेगा इसके कोई संकेत उपलब्ध नहीं हैं. सवाल बड़ा साफ़ है कि अगर ये आरक्षण हो भी गये तो क्या महिलाऒं का स्थिति बद्दल जायेगी. बिहार में भी पंचायती चुनावों में महिलाऒं को आरक्षण मिला. पर इसका परिणाम ठीक वही हुआ जो ’वेलडन अब्बा’ में दिखाये गांव की सरपंच का हुआ था. इनकी भुमिका बस दस्तखत करने और मोहर लगाने तक ही सीमित है. पदवी दिखती तो औरतों की है पर कब्ज़ा मर्दों का ही होता है. परिणाम यह होता है कि भ्रष्टाचार में लिप्त तो पति होते हैं पर जब भी ऐसे केस सामने आते हैं तो कानून के शिकंजे में औरत ही फंसती हैं चुंकि काग़ज़ पर जन-प्रतिनिधि तो वही हैं.
भारत भले ही आज़ाद हो पर असल में यहां की आधी आबादी अब भी गुलाम है. तो क्या अगर इस राष्ट्र की तीनों सेना एक महिला कमांडर के हाथों में है. तो क्या अगर इस देश का मंत्री मंडल एक महिला के इशारों का मोहताज है. तो क्या अगर इस देश की राजधानी और यहां के सबसे बड़े राज्यों में से एक ऊत्तर-प्रदेश की कमान एक स्त्री के हाथों में है. ऐसे नजाने और कितने उदाहरण हैं जो सिर्फ़ अपने मतलब की रोटी सेंकने में ही यक़ीन रखते हैं. एक महिला और बाल विकास मंत्रालय का गठन हुआ था लेकिन वो सिर्फ़ हाथी-दांत बनकर ही रह गया है जिसके आने से न तो अपराध कम हुए न ही विकास का दर बढ़ गया.
रिसर्च वर्क बहुत अच्छा है....लगे रहो...यूँ ही बखिया उधेङते रहो...
प्रत्युत्तर देंहटाएंआंकडे बहुत ही कष्टप्रद हैं !!
प्रत्युत्तर देंहटाएंachha hai.....badhiya.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबढिया है......लगे रहो...
प्रत्युत्तर देंहटाएंIt sems that you have done too much researches before writing this post .well done dost badhiy6aa kaam hai
प्रत्युत्तर देंहटाएंrahul bahut accha likha hai kaafi research k baad jo kuch bhi tumne likha hai usme kaant chaant karne layak kuch bhi nahi hai.har shabd ki apni alag mehta hai.great article
प्रत्युत्तर देंहटाएंaadhi aabaadi ka sach bahut kadwa hai..
प्रत्युत्तर देंहटाएंधन्यवाद राहुल,
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत ही अच्छे ढंग से लिखी एक तीखी रिपोर्ट।
मज़ेदार बात तो यह है कि महिला आरक्षण को लेकर पढ़े लिखे समाज ने ऐसा माहौल बनाया जैसा महिलाओं को आज़ादी बस मिलने ही वाली है। लेकिन आरक्षण जैसे प्रतिक्रियावादी कदमों से स्त्रियों के बहुलांश का कोई भला नहीं होने वाला। हां, मध्यवर्गीय जमातों की महिलाओं को जरूर थोड़ा लाभ पहुंचेगा।
अगर स्त्रियों को आजादी चाहिए तो उन्हें सबसे पहले धार्मिक परंपराओं-मान्यताओं को टक्कर देनी होगी और निश्चित ही कुर्बानियां भी। पुरुष प्रधान समाज आरक्षण के थाल में परोसकर उन्हें आज़ादी नहीं देने वाला।