सोमवार, 23 अगस्त 2010

वो लड़की…


वो लड़की कौन है, उसका नाम क्या है, क्या करती है, कहां रहती है… कुछ भी पता नहीं. पता है तो बस इतना कि वो एक नेक-दिल लड़की है.
दिल्ली के बाराखंबा मेट्रो स्टेशन पे बैठा मैं अपनी एक दोस्त का इंतज़ार कर रहा था जब वो लड़की आगे से निकली थी. काले रंग का टॉप, उसी रंग की कैप्री, और गहरे ग्रे कलर की बैग लिए जा रही थी वो. थोड़ी मोटी, थोड़ी सांवली थी. वो ग्रुप में थी. उसके साथ जा रहे थे चार लड़कियां और पांच लड़के. असल में उसके साथ जा रही थी – ग़रीबी, भूख, प्यास, आस और चंद सूखे चेहरे. सबकी उमर सात से बारह बरस के बीच की होगी. सब अभाव-ग्रस्त अभागे थे. ल़ड़कों का शर्ट चाहे जिस भी रंग का रहा हो – उजला, हरा, पीला या नीला…. सब एक ही रंग में रंग चुका था. मटमैला. सबकी पैंट बेसाइज़ थी. किसी के पैर में चप्पल नहीं था. लड़कियों ने जो कुछ पहन रखा था वो भी किसी की खैरात ही जान पड़ती थी. सबके बाल बिन तेल, बिन शैम्पू भूरे और रूखे थे. सबका चेहरा धूल और माटी की थपेड़ खा-खा कर काला हो चुका था. पर फिर भी सबके चेहरे पे खुशी थी… उस एक लड़की की वजह से.
ऐसा कौन सा मंतर फूंका था उसने. कुछ भी नहीं. कुछ पैसे दिए होंगे या कुछेक टॉफ़ियां. या फिर आइसक्रीम खिला दी होगी. क्य सिर्फ़ इतना ही. नहीं. उन्हें देखते ही वो बाक़ियों की तरह मुंह बनाकर दूसरी तरफ़ घूमी नहीं होगी. चेहरे पर उसके घृणा वाला भाव नहीं आया होगा. उन्हें डांट कर उसने भगाया नहीं होगा बल्कि उनसे बात की होगी. उसने अपने वक़्त में से दस मिनट निकाला होगा. उनसे अच्छी-अच्छी बातें की होगी. उनके हाथ में हाथ डालकर उनके सपने को जीया होगा शायद!! या फिर उन्हें जिलाने की कोशिश की होगी.
मैंने देखा था जब वो बस स्टैंड पर थी. वो सबको गले लगा रही थी. कुछ को चूमा भी. शायद ये उसके जाने का वक़्त था पर जो खुशी वो उन आंखों में छोड़ गयी थी वो क्या कम था. मैं बस देखता रह गया. बच्चे बिखर चुके थे. कुछ इधर. कुछ उधर. लड़की जा चुकी थी.
सर्वणा भवन में बैठ कर जब डोसा तोड़ रहा था, सांवर-वाडा का मज़ा ले रहा था, कॉफ़ी की चुस्की के साथ अपनी दोस्त से बातें कर रहा था तो मैं बस उसके साथ नहीं था. मेरा ध्यान उस लड़की और उन बच्चों पर भी था. मैं बंटा हुआ था. सोच रहा था – काश इस तरह.. कुछ पल की खुशी… कुछ नाउम्मीद बच्चों को… मैं भी दे सकता!! पर मैं तो एक संवेदनहीन और निष्क्रिय भीड़ का हिस्सा हूं. देखता हूं. सोचता हूं. भूल जाता हूं.

9 comments:

  1. hum sabhi kuch na kuch samaj ke liye masoom bachhon ke liye kuch na kuch karne chahte hain...but apni majbooriyon ka rona lekar baith jaate hain...jo waqai nek dil rakhte hain wo society mein kuch na kuch add karte hain wo bhi bina kisi shikayat ke...

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  2. बिल्कुल सही कहा सिर्फ़ कुछ लम्हे अपनी ज़िन्दगी के अगर बाँट लिये जायें तो और कुछ हो या न हो मगर आत्मिक और मानसिक शांति जरूर मिलेगी।

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  3. कुछ पल की खुशी… कुछ नाउम्मीद बच्चों को… मैं भी दे सकता!! पर मैं तो एक संवेदनहीन और निष्क्रिय भीड़ का हिस्सा हूं. देखता हूं. सोचता हूं. भूल जाता हूं.
    सच को स्‍वीकार किया है आपने .. रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाएं !!

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  4. उस जिंदादिल लड़की को सलाम. वाकई इस तरह के लोग अब कम ही हैं. और जो हैं वो वास्तव में अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं.

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  5. अच्छी सोच है आपकी , गहरे भाव समेटे अच्छी पोस्ट ।

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  6. वह राहुल सच में बहुत अच्छा लिखा है.पड़ते वोक्त उस लड़की की तस्वीर आँखों में थी और दर्द दिल में था.
    ऐसा लगा की सच में हम सब उसी भीड़ का हिस्सा हैं और में भी.

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  7. ye likhna sahi nahi hoga ki achha likhe hain.
    kyunki aap achha likhte hi ho.
    काश इस तरह.. कुछ पल की खुशी… कुछ नाउम्मीद बच्चों को… मैं भी दे सकता!! पर मैं तो एक संवेदनहीन और निष्क्रिय भीड़ का हिस्सा हूं. देखता हूं. सोचता हूं. भूल जाता हूं.
    sahi kaha.

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  8. "देखता हूं. सोचता हूं. भूल जाता हूं".. कभी-कभी लगता है कि वक्त के साथ चीज़ों को भूल जाना इंसान के लिए सबसे बड़ा वरदान है तो कभी-कभी लगता है सबसे बड़ा अभिशाप

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