
स्त्रीवाद तार्किक है और सही है. शायद इसलिए आकर्षक, प्रभावी और बौधिक भी लगता है. एक समाज जो हजारों साल से पुरुष प्रधान और पितृ सत्तात्मक रहा है, वहां आजकल नौजवानों-नवयुवतियों का स्त्रीवादी रुझान वाकई आशातीत है, लेकिन यह मान लेना कि चीज़ें वाकई बदल गई हैं या बदल रही हैं, शायद बहुत जल्दबाजी होगी. कई संयोगों और प्रयोगों से सामना होना बाक़ी है. कई आश्चर्यजनक, सुखद और दुखद संदर्भों से दो-चार होना बाक़ी है.
स्त्री-विमर्श से कोई स्त्री-पुरुष जितना बौधिक दिखता है, सही मायनो में स्त्रीवाद को अपनाने के बाद उतना ही खड़हूस (स्त्री) और वैरागी (पुरुष) दिखेगा. वो इसलिए कि एक फ़ैमिन्स्ट स्त्री को मैन-हेटर तो नहीं होना चाहिए लेकिन शंकालू ज़रूर होना चाहिए (क्यों, ये आगे समझाने की कोशिश करूंगा) ऐसे में उसे सामान्य तौर पर खड़हूस ही माना जाएगा. उसी तरह स्त्रीवादी पुरुष जब स्त्री स्वतंत्रता और सम्मान की बात करेगा तो यह किस्सा दुनिया से शुरू होकर उसके घर नहीं, बल्कि उसके घर से शुरू होकर दुनिया में जाएगा, और बेहद स्पष्ट है कि जो पुरुष अपनी मां, बहन, पत्नी और प्रेमिका की स्वतंत्रता और उनके आक्रोश को सहजता से लेगा, समझेगा, उसे यह समाज वैरागी, निर्मोही या पागल तक करार देगा.
भारतीय समाज के हजारों साल से चले आ रहे अंध-अनुशासन और वाहियात तंत्र की आदत हमें बुरी तरह लगी है. इससे निकल सकना बहुत कठिन है. ऐसे में महज विमर्शों के आधार पर किसी स्त्री-पुरुष का चरित्र गढ़ लेना संतुलित नहीं है. चर्चाओं और बहसों पर आधारित किसी व्यक्ति विशेष की सार्वजनिक छवि को सच मान लेना खतरनाक निष्कर्षों को जन्म दे सकता है. संदेह और पूर्वाग्रह जैसे नकारात्मक शब्दों का धरातली इस्तेमाल स्त्रीवाद को मजबूत करने के लिए बहुत जरूरी है. वरना जाने-अंजाने बहुत बड़ा धोखा खाना पड़ सकता है. ऐसे संदेहों और पूर्वाग्रहों के माकूल तर्क हैं जिन्हें आसानी से समझा जा सकता है. असंदिग्ध सिर्फ पत्थर ही हो सकते हैं.
मैं ये नहीं कहता कि अमुक आदमी या औरत दोगला है, अपनी ही बातों पर सही नहीं उतरता, भरोसे के काबिल नहीं है, क्योंकि ऐसा कहना उस प्रयास का मज़ाक़ उड़ाना हो जाएगा जो वह व्यक्ति विशेष स्त्रीवाद की दिशा में बढ़ने के लिए कर रहा है. असल में हम बचपन से ही ऐसे तंत्र में घिरे हैं जिनने हम पुरुषों को भोगी और स्त्रियों को योगी बना रखा है. योगी से मेरा मतलब समर्पिता का है. कुछ गिनती के घरों को छोड़ दें और बहुलांश में बात करें तो बेटियों को समपर्ण और निर्भरता का पूरा प्रशिक्षण दिया जाता है जैसे- किचन में मां का हाथ बंटाते बड़ी होती हैं, स्कूल में बड़े भाई के डॉन होने या किसी लड़ाके लड़के दोस्त की वजह से आश्वस्त रहती हैं कि कोई उन्हें छेड़ेगा नहीं, दो भाइयों में जिस तरह का द्वेष, ईर्ष्या, और स्पर्धा एक घर में दिखती है वैसा अमूमन एक भाई-बहन के बीच नहीं दिखता (सकारात्मक है लेकिन इसके भी अपने दुष्प्रभाव हैं), शादी के बाद पति के घर में रहना, अपने मां-बाप से दूर, उनके परिवार को अपनाना आदि. वहीं बेटों को सत्ता संभालने और भोग करने का प्रशिक्षण मिलता है जैसे- बना-बनाया भोजन, साफ बिस्तर, धुले कपड़े… उन्हें खुद मिहनत नहीं करनी पड़ती, उनके घर से देर तक बाहर रहने पर कम ही सवाल उठते हैं. कम शब्दों में कहूं तो कथित नैतिक जिम्मेदारियों का बोझ स्त्रियां उठाती है और भौतिक जिम्मेदारियां घर के पुरुष उठाते हैं. तो इस तरह एक पक्षपातपुर्ण अनुशासन जिसमें हम अपनी लगभग आधी ज़िंदगी गुजार चुके हैं, वो भी जीवन का वह हिस्सा जहां सीखने और उनमें ढलने की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है, को बदल देना मुश्किल है.
baat sahi hai, zyadaatar gharon mein yahi hota hai...tumhara view point bhi theek hai
प्रत्युत्तर देंहटाएंदोस्तों
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपनी पोस्ट सोमवार(10-1-2011) के चर्चामंच पर देखिये ..........कल वक्त नहीं मिलेगा इसलिए आज ही बता रही हूँ ...........सोमवार को चर्चामंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराएँगे तो हार्दिक ख़ुशी होगी और हमारा हौसला भी बढेगा.
http://charchamanch.uchcharan.com
sach to sach h.....aapne b vhi kaha...stritv k bachaav me aage aane ki zarurat h.
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