
श्रवण जी के यहां बराबर चाय पीने जाता हूं. चाय के साथ दो नारियल वाला बिस्कुट और चाय खत्म होते ही दो अंडों का ऑमलेट बटर में, यह मेरा रोज़ का कोटा है. मुनिरका के ठसाठस मकानों से भरे उस मुहल्ले की गली में श्रवण जी के ठीक पड़ोस में एक इस्त्री वाली महिला हैं. पतली-दुबली, पिचके चेहरों वाली. उसका रंग काले से थोड़ा-सा कम और सांवले से थोड़ा अधिक गहरा है. चार टांगों वाले तख्ते के नीचे कपड़ों की गठरी पड़ी होती है, उपर एक कोने में वे कपड़े पड़े होते हैं जिन पर पहले-पहले इस्त्री चलानी है. दूसरे कोने में वह तख्ते पर बिछे चादर के नीचे ग्राहक से मिले पैसे संभालकर रखती है.
मेरी आदत (हो सकता है इसे आप बुरा कहें) है आसपास की चीजों, लोगों, उनके हाव-भाव (यहां तक कि उनके कपड़े भी, लिंगनिरपेक्ष होकर) अदि को ध्यान से देखना. सो यह महिला भी मेरी उसी आदत की वजह से मेरे इस पोस्ट का हिस्सा बन रही है. मैंने आज तक उसे अपने काम के अलावा कुछ बोलते नहीं सुना. कोई ग्राहक आता है, बोलता है, पांच कपड़े हैं. वह चुपचाप गिनती है, और बस इतना बोलती है- ठीक है. कब तक मिलेगा, सामान्यतः ग्राहक का अगला सवाल यही होता है. और जवाब भी एक जैसा ही होता है- शाम तक (चूंकि मैं अकसर श्रवण के यहां सुबह ही चाय पीने जाता हूं). इसके अलावा पैसों की लेन-देन के दौरान दो-चार चीजें वह कहती होगी. बाकी मैंने उसके मुंह से कभी कुछ नहीं सुना. अपने काम में खोयी हुई, काले रंग का भारी प्रेस अपनी कमज़ोर कलाई से कपड़ों पर घिसती...जाने क्या सोचती-सी लगती है. हां मैंने उसके चेहरे पर आज तक कभी हंसी-खुशी जैसी कोई चीज भी महसूस नहीं की है. दुख भी नहीं. कोई भाव ही नहीं. अजीब रूप से उदासीन चेहरा जिसे मैं उकेरने में भले फेल हो जाऊं लेकिन मेरे मस्तिष्क में उसकी तसवीर बिलकुल स्पष्ट है.
उसका एक बेटा भी है. रंग-रूप में बिलकुल मां पर ही गया होगा (वैसे मैंने उसके पिता को नहीं देखा है). उसका चेहरा मां की तरह ही थोड़ा लंबा है, रंग बिलकुल वैसा ही और गाल पिचके हुए हैं. मां छोटे क़द की है पर बेटे को देखकर लगता है कि बड़ा होगा तो बढ़ेगा. सुबह मां के साथ ही कोने में खड़ा होता है. गहरे नीले रंग की हाफ पैंट और कभी-कभी उसी रंग की जींस पैंट में दिखता है. दो-तीन टीशर्ट बदल-बदलकर पहनता है और कभी-कभार वह क्रीम कलर की कॉलर वाली शर्ट पहने भी दिखता है. खड़े-खड़े जब उसका मन उचटता है तो गली में खेल रहे बच्चों के साथ मिलकर बैट-बॉल खेलने लगता है. यही कोई चौदह-पंद्रह साल का होगा.
मैंने उसके चेहरे पर आज तक कभी हंसी-खुशी जैसी कोई चीज भी महसूस नहीं की है. दुख भी नहीं. कोई भाव ही नहीं. अजीब रूप से उदासीन चेहरा जिसे मैं उकेरने में भले फेल हो जाऊं लेकिन मेरे मस्तिष्क में उसकी तसवीर बिलकुल स्पष्ट है
मां जब भी गठरी उठाकर किसी का कपड़ा पहुंचाने जाती तो उसकी ड्यूटी होती दुकान की निगरानी करना. और जैसे ही मां आती तो उसे कहती, 'जा खेल ले, यहां मत खड़ा हो.' वह चुपचाप सुनता और थोड़ी देर बाद वहां से खिसक जाता. वह लड़का भी मुझे उदासीन-सा लगता है. अवसादग्रस्त. खुशी और हंसी से दूर, किसी हीन-भावना से ग्रस्त.
हर दिन की तरह उस दिन भी मैं श्रवण जी की दुकान के सामने लगे बेंच पर बैठा चाय सुरक रहा था. अपनी आदत से लाचार कभी गुज़रते हुए बच्चों को देखता, कभी दादा जी की उमर के आदमी को बिना मतलब मां-बहन करते हुए गुज़रते देखता, कभी वहीं बगल में सब्जी और अखबार की मिली-जुली दुकान का काउंटर सभाले बैठी छोटी और प्यारी-सी उस लड़की को देखता (जो दुकानदारी में बिल्कुल प्रौढ़ हो चुकी है), तो कभी आगे से गुज़र रहे लड़कों, लड़कियों को नोटिस करता. और घूम-फिरकर उस इस्त्री वाली महिला के पास पहुंच जाता.
एक भाई साहब उस इस्त्री वाली दुकान पर कपड़ों का एक गट्ठर लेकर आए. और चौपाये तख्ते पर अपना बोझ हल्का कर लिया. 'पांच शर्ट, पांच पैंट', भाई साहब ने कहा. बोली से मैंने अंदाज़ा लगाया, शायद बिहारी थे. जवाब आया, 'ठीक है.' अगला सवाल, 'कब तक हो जाएगा.' 'शाम तक', नपा-तुला अनुमानित जवाब.
भाई साहब कुछ ज़्यादा ही सामाजिक थे. जाते-जाते कोने में खड़े बच्चे पर नज़र पड़ी. उन्होंने महिला से पूछा, 'आपका बेटा है?' इस्त्री वाली महिला ने हामी भरी. साहब ने अभिभावकीय अंदाज़ में हल्की-सी डांट के साथ उस बच्चे को कहा, 'मां को हाथ क्यों नहीं बंटाता, काम सीख लेगा तो तेरी मां को आराम होगा और कमाई भी बढ़ेगी.' बच्चे ने नज़रें नीची कर ली. वही हीन भावना और अवसाद मुझे उसके चेहरे पर फिर से दिखा था. मां ने तुरंत जवाब दिया, 'साहब, हम इस्त्री करने का काम करते हैं तो क्या हमारा बच्चा भी यही करेगा? हम उसे पढ़ा रहे हैं, उसे यह सब नहीं करना है.' बच्चे की तरफ़ देखते हुए मां ने कहा, 'जाओ बेटा, यहां मत खड़े रहो.'
याद आया मुझे कि बचपन में जब मुझे पहली बार यह समझ आया था कि मेरे बाबूजी बस के मालिक नहीं बल्कि कंडक्टर हैं तो ऐसी ही हीन-भावना के चपेट में मैं भी था. हालांकि वह ज़्यादा वक्त तक टिक नहीं पायी, शायद इस वजह से कि मुझे वह सारी सुविधाएं मिली जो किसी सामान्य मध्यवर्गी परिवार के बच्चों को मिलती हैं. इस्त्री वाली महिला भी उसी कवायद में लगी है और शायद अपने बच्चे को सुरक्षा-भाव दिलाने की चुनौती ही उसके चेहरे पर हंसी-खुशी का भाव नहीं आने देती.
(इलेस्ट्रेशन वीरेन्द्र शर्मा के ब्लॉग पॉइंट ऑफ़ व्यू से लिया गया है)
shayad yahi duniya hai.Kal tak jo aapki sachai hoti hai wo aaj mahaj ek mazak ki cheez jis se aap dusoron ki kajboori ka mazzak uthate hai.Kabhi sochta hoon kya yahi dekhane uppar wala hume yahan bhejta hai? Ye kaisa samaj hai?Uss samaj mein kahin main to shamil nahin?
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