
जहां देश की एक दशमलव कुछ फ़ीसदी आबादी ही अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल देखती है, ऐसे में हिंदी चैनलों के रसातल में जाने का सिलसिला देश के विशाल दर्शक वर्ग के लिए चिंता का सबब है
मेरे पास इंटरनेट है, टेलिविज़न नहीं है. फ़ेसबुक के लिए अधिक समय है बजाय इसके कि बीबीसी की वेबसाइट खोलकर कुछ खबर पढ़-देख लूं. असल में वहां की तीन-चार प्रोफ़ाइलों को विज़िट करो तो मतलब की खबरें यूं भी मिल ही जाती है. खैर अविनाश दास की वॉल से मोहल्ले की उस नुक्कड़ पर पहुंचा जहां राजकिशोर और अविनाश का (ई)मेल-मिलाप छपा था. फिर जीमेल पर आए लिंक्ड इन अपडेट से वह लिंक मिला जिसने यूट्यूब तक पहुंचाया. जहां बीबीसी वर्ल्ड की एक वीडियो में करण थापड़ जयललिता पर पिले हुए थे.
खैर इंटरनेट के साथ मज़ेदार बात यह है कि जब आप कुछ ढूंढ़ रहे होते हैं तो कुछ और भी मिल ही जाता है. नरेंद्र मोदी और करण थापड़ का 3 मिनट 23 सैकेंड का वह विडियो भी दाहिनी तरफ़ दिखा जिसमें मोदी बीच में ही अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेते हैं. डेढ़-दो साल पहले वह विडियो मेरे दोस्त विकास ने मुझे दिखाई थी. आज दोबारा देखने के बाद मन हुआ कि मोदी के कुछ और इंटरव्यू देखे जाएं सो देखा भी. टाइम्स नाउ, एनडी टीवी इंडिया के अलावा इंडिया टीवी का इकलौता कामचलाऊ शो आपकी अदालत और आजतक पर प्रभु चावला की सीधी बात जिसमें सामने वाला अच्छा हो बुरा हो, मक़सद बस उसकी व्हाट लगाना होता है.
एक-एक कर सारी वीडियो देखने के बाद मुझे यह बिलकुल समझ नहीं आया कि रजत शर्मा के 'जनता की अदालत' में उनके ऊपर आरोप मढ़ा जा रहा था कि उनका महिमामंडन किया जा रहा था. अब एक सवाल लीजिए, 'आप पर आरोप है कि आप खतरों के खिलाड़ी हैं...आप बचपन में मगरमच्छ के ज़िंदा बच्चे को उठा लाए थे.' रजत शर्मा की हिंदी इतनी कमज़ोर तो नहीं होगी कि उन्हें तारीफ़ और इल्ज़ाम में फ़र्क़ न पता हो!
वहीं दूसरी ओर सीधी बात में नरेंद्र मोदी को आतंक का यमराज और नरेंद्र भाई कहकर संबोधित करने वाले प्रभु चावला की अकड़ चापलूसी में तब्दील होती हुई दिख रही थी. अब इसकी वजह रिलायंस, मोदी और प्रभु के बीच बने त्रिकोणीय संबंध थे या क्या, कह नहीं सकता. इसके अलावा कुछ और वीडियो भी देखे. सहारा समय के संजय बरागटा और सीएनबीसी के संजय पुगलिया मोदी का इंटर्व्यू कर रहे थे कि उनकी ब्रांड बिल्डिंग, मेरे पल्ले नहीं पड़ा. हां इतना पक्का था कि वे सवाल नहीं कर रहे थे. ज़ी की एंकर स्वाती चतुर्वेदी भी नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने की बजाय उनके साथ इस आंकड़ेबाज़ी में लगी थी कि भारत में आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं. नरेंद्र मोदी को इस तरह से इंट्रोड्यूस करवाया जा रहा था जैसे उनसे मिलने का सपना संजोये संपादक व पत्रकार गण न जाने कब से बैठे थे. अति तक अभिभूत थे सब के सब.
वहीं अंग्रेज़ी में टाइम्स नाउ, हेडलाइंस टुडे और सीएनएन आईबीएन के तेवर बिलकुल अलग थे. चाहे वो करण हो या अर्नब...नपे-तुले और सधे सवाल.
आखिर हिंदी के खबरिया चैनलों में पत्रकारिता वाली ठसक क्यों नहीं दिखती? क्यों वे सवाल नहीं कर पाते? एक सैकेंड को मान भी लें कि बाज़ार हावी है या ऊपर से दबाव है तो भी यह कैसे मुमकिन है कि सवाल करने वाली जगह पर होते हुए आप महिमामंडन करने लगें? ठीक है ऊंगली उठाने पर मनाही होगी लेकिन जूते चाटने की क्या विवशता है? क्या यह न माना जाए कि मामला बाज़ार और ऊपरी दबाव से ज़्यादा असल में अपने निजी संबंध बनाने से जुड़ा है?
मुझे याद आ रहा है एक दफ़ा अपने किसी दोस्त के पास बैठा टीवी देख रहा था. आईबीएन-7 पर सलमान खान आए थे. एंकर, प्रोड्यूसर और चैनल के दर्ज़नों लोग उसके स्वागत में इस तरह खड़े थे मानो सलमान अपने फ़िल्म का प्रोमोशन करने नहीं इस चैनल पर एहसान करने आया था. अजीब नौटंकी हो रही थी. खबरिया चैनल पर सलमान के साथ टीवी वाले क्रिकेट खेल रहे थे!! और उस महिला एंकर का नाम मुझे याद नहीं, इतना याद है कि वह एंकर कम और सलमान के लिए पागल-से किसी फ़ैन की तरह लग रही थी.
हिंदी टीवी चैनलों में ख़बरों के नाम पर भूत, प्रलय और पंडित परोसे जा रहे हैं और इंटर्व्यू के नाम पर पीआर किया जा रहा है तो भला क्यों न बौधिक वर्ग इनसे दूरी बनाए रखना पसंद करे. मुझे तो यह भी लगता है कि अगर यही हालत रही तो कुछ वक्त बाद हिंदी समाचार चैनलों के दर्शकों को भी ओछा समझा जाने लगेगा.
nice to read this..
प्रत्युत्तर देंहटाएंNDTV pe "Ravish ki report" aaya kuchh din..
aaj kal Raveesh kumaar Primetime lekar aate hain roz raat 9 baje..tevar to bahot teekhe unke bhi nahin..par swachhandata hai..unhe dekh kar shayad apki takleef kuchh had tak dur ho..!!