<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392</id><updated>2011-10-06T10:25:40.864-07:00</updated><category term='पाकिस्तान'/><category term='crime against woman'/><category term='ढोंग'/><category term='अब होश लिखो'/><category term='woman in india'/><category term='मुल्क की मय्यत'/><category term='माथा-पच्ची'/><category term='गीत'/><category term='बंदगी'/><category term='दारू की खुमारी'/><category term='woman impowerment'/><category term='धर्म की क्षय'/><title type='text'>दो टूक</title><subtitle type='html'>अपने मन की गंगा...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>32</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-144620737011809946</id><published>2011-05-19T03:23:00.000-07:00</published><updated>2011-05-19T03:24:32.365-07:00</updated><title type='text'>चाटूकारिता की दीमक और खोखला होता चौथा खंभा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-6nXIk79cEXk/TdTv2IB0y5I/AAAAAAAAAK4/ChjxhmdmRaQ/s1600/image002.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 152px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-6nXIk79cEXk/TdTv2IB0y5I/AAAAAAAAAK4/ChjxhmdmRaQ/s200/image002.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5608371149130222482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जहां देश की एक दशमलव कुछ फ़ीसदी आबादी ही अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल देखती है, ऐसे में हिंदी चैनलों के रसातल में जाने का सिलसिला देश के विशाल दर्शक वर्ग के लिए चिंता का सबब है&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेरे पास इंटरनेट&lt;/strong&gt; है, टेलिविज़न नहीं है. फ़ेसबुक के लिए अधिक समय है बजाय इसके कि बीबीसी की वेबसाइट खोलकर कुछ खबर पढ़-देख लूं. असल में वहां की तीन-चार प्रोफ़ाइलों को विज़िट करो तो मतलब की खबरें यूं भी मिल ही जाती है. खैर अविनाश दास की वॉल से मोहल्ले की उस नुक्कड़ पर पहुंचा जहां राजकिशोर और अविनाश का (ई)मेल-मिलाप छपा था. फिर जीमेल पर आए लिंक्ड इन अपडेट से वह लिंक मिला जिसने यूट्यूब तक पहुंचाया. जहां बीबीसी वर्ल्ड की एक वीडियो में करण थापड़ जयललिता पर पिले हुए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर इंटरनेट के साथ मज़ेदार बात यह है कि जब आप कुछ ढूंढ़ रहे होते हैं तो कुछ और भी मिल ही जाता है. नरेंद्र मोदी और करण थापड़ का 3 मिनट 23 सैकेंड का वह विडियो भी दाहिनी तरफ़ दिखा जिसमें मोदी बीच में ही अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेते हैं. डेढ़-दो साल पहले वह विडियो मेरे दोस्त विकास ने मुझे दिखाई थी. आज दोबारा देखने के बाद मन हुआ कि मोदी के कुछ और इंटरव्यू देखे जाएं सो देखा भी. टाइम्स नाउ, एनडी टीवी इंडिया के अलावा इंडिया टीवी का इकलौता कामचलाऊ शो आपकी अदालत और आजतक पर प्रभु चावला की सीधी बात जिसमें सामने वाला अच्छा हो बुरा हो, मक़सद बस उसकी व्हाट लगाना होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक-एक कर सारी वीडियो देखने के बाद मुझे यह बिलकुल समझ नहीं आया कि रजत शर्मा के 'जनता की अदालत' में उनके ऊपर आरोप मढ़ा जा रहा था कि उनका महिमामंडन किया जा रहा था. अब एक सवाल लीजिए, 'आप पर आरोप है कि आप खतरों के खिलाड़ी हैं...आप बचपन में मगरमच्छ के ज़िंदा बच्चे को उठा लाए थे.' रजत शर्मा की हिंदी इतनी कमज़ोर तो नहीं होगी कि उन्हें तारीफ़ और इल्ज़ाम में फ़र्क़ न पता हो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं दूसरी ओर सीधी बात में नरेंद्र मोदी को आतंक का यमराज और नरेंद्र भाई कहकर संबोधित करने वाले प्रभु चावला की अकड़ चापलूसी में तब्दील होती हुई दिख रही थी. अब इसकी वजह रिलायंस, मोदी और प्रभु के बीच बने त्रिकोणीय संबंध थे या क्या, कह नहीं सकता. इसके अलावा कुछ और वीडियो भी देखे. सहारा समय के संजय बरागटा और सीएनबीसी के संजय पुगलिया मोदी का इंटर्व्यू कर रहे थे कि उनकी ब्रांड बिल्डिंग, मेरे पल्ले नहीं पड़ा. हां इतना पक्का था कि वे सवाल नहीं कर रहे थे. ज़ी की  एंकर स्वाती चतुर्वेदी भी नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने की बजाय उनके साथ इस आंकड़ेबाज़ी में लगी थी कि भारत में आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं. नरेंद्र मोदी को इस तरह से इंट्रोड्यूस करवाया जा रहा था जैसे उनसे मिलने का सपना संजोये संपादक व पत्रकार गण न जाने कब से बैठे थे. अति तक अभिभूत थे सब के सब.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं अंग्रेज़ी में टाइम्स नाउ, हेडलाइंस टुडे और सीएनएन आईबीएन के तेवर बिलकुल अलग थे. चाहे वो करण हो या अर्नब...नपे-तुले और सधे सवाल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर हिंदी के खबरिया चैनलों में पत्रकारिता वाली ठसक क्यों नहीं दिखती? क्यों वे सवाल नहीं कर पाते? एक सैकेंड को मान भी लें कि बाज़ार हावी है या ऊपर से दबाव है तो भी यह कैसे मुमकिन है कि सवाल करने वाली जगह पर होते हुए आप महिमामंडन करने लगें? ठीक है ऊंगली उठाने पर मनाही होगी लेकिन जूते चाटने की क्या विवशता है? क्या यह न माना जाए कि मामला बाज़ार और ऊपरी दबाव से ज़्यादा असल में अपने निजी संबंध बनाने से जुड़ा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद आ रहा है एक दफ़ा अपने किसी दोस्त के पास बैठा टीवी देख रहा था. आईबीएन-7 पर सलमान खान आए थे. एंकर, प्रोड्यूसर और चैनल के दर्ज़नों लोग उसके स्वागत में इस तरह खड़े थे मानो सलमान अपने फ़िल्म का प्रोमोशन करने नहीं इस चैनल पर एहसान करने आया था. अजीब नौटंकी हो रही थी. खबरिया चैनल पर सलमान के साथ टीवी वाले क्रिकेट खेल रहे थे!! और उस महिला एंकर का नाम मुझे याद नहीं, इतना याद है कि वह एंकर कम और सलमान के लिए पागल-से किसी फ़ैन की तरह लग रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी टीवी चैनलों में ख़बरों के नाम पर भूत, प्रलय और पंडित परोसे जा रहे हैं और इंटर्व्यू के नाम पर पीआर किया जा रहा है तो भला क्यों न बौधिक वर्ग इनसे दूरी बनाए रखना पसंद करे. मुझे तो यह भी लगता है कि अगर यही हालत रही तो कुछ वक्त बाद हिंदी समाचार चैनलों के दर्शकों को भी ओछा समझा जाने लगेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-144620737011809946?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/144620737011809946/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/144620737011809946'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/144620737011809946'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='चाटूकारिता की दीमक और खोखला होता चौथा खंभा'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-6nXIk79cEXk/TdTv2IB0y5I/AAAAAAAAAK4/ChjxhmdmRaQ/s72-c/image002.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-2845796508703570911</id><published>2011-04-30T10:09:00.000-07:00</published><updated>2011-04-30T10:22:54.432-07:00</updated><title type='text'>इस्त्री वाली महिला</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-Qe-nEUCxluo/TbxFZoEzklI/AAAAAAAAAKw/vDJeC9QFxS8/s1600/maa.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 142px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-Qe-nEUCxluo/TbxFZoEzklI/AAAAAAAAAKw/vDJeC9QFxS8/s200/maa.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5601428343098675794" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;श्रवण जी के&lt;/strong&gt; यहां बराबर चाय पीने जाता हूं. चाय के साथ दो नारियल वाला बिस्कुट और चाय खत्म होते ही दो अंडों का ऑमलेट बटर में, यह मेरा रोज़ का कोटा है. मुनिरका के ठसाठस मकानों से भरे उस मुहल्ले की गली में श्रवण जी के ठीक पड़ोस में एक इस्त्री वाली महिला हैं. पतली-दुबली, पिचके चेहरों वाली. उसका रंग काले से थोड़ा-सा कम और सांवले से थोड़ा अधिक गहरा है. चार टांगों वाले तख्ते के नीचे कपड़ों की गठरी पड़ी होती है, उपर एक कोने में वे कपड़े पड़े होते हैं जिन पर पहले-पहले इस्त्री चलानी है. दूसरे कोने में वह तख्ते पर बिछे चादर के नीचे ग्राहक से मिले पैसे संभालकर रखती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी आदत (हो सकता है इसे आप बुरा कहें) है आसपास की चीजों, लोगों, उनके हाव-भाव (यहां तक कि उनके कपड़े भी, लिंगनिरपेक्ष होकर) अदि को ध्यान से देखना. सो यह महिला भी मेरी उसी आदत की वजह से मेरे इस पोस्ट का हिस्सा बन रही है. मैंने आज तक उसे अपने काम के अलावा कुछ बोलते नहीं सुना. कोई ग्राहक आता है, बोलता है, पांच कपड़े हैं. वह चुपचाप गिनती है, और बस इतना बोलती है- ठीक है. कब तक मिलेगा, सामान्यतः ग्राहक का अगला सवाल यही होता है. और जवाब भी एक जैसा ही होता है- शाम तक (चूंकि मैं अकसर श्रवण के यहां सुबह ही चाय पीने जाता हूं). इसके अलावा पैसों की लेन-देन के दौरान दो-चार चीजें वह कहती होगी. बाकी मैंने उसके मुंह से कभी कुछ नहीं सुना. अपने काम में खोयी हुई, काले रंग का भारी प्रेस अपनी कमज़ोर कलाई से कपड़ों पर घिसती...जाने क्या सोचती-सी लगती है. हां मैंने उसके चेहरे पर आज तक कभी हंसी-खुशी जैसी कोई चीज भी महसूस नहीं की है. दुख भी नहीं. कोई भाव ही नहीं. अजीब रूप से उदासीन चेहरा जिसे मैं उकेरने में भले फेल हो जाऊं लेकिन मेरे मस्तिष्क में उसकी तसवीर बिलकुल स्पष्ट है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका एक बेटा भी है. रंग-रूप में बिलकुल मां पर ही गया होगा (वैसे मैंने उसके पिता को नहीं देखा है). उसका चेहरा मां की तरह ही थोड़ा लंबा है, रंग बिलकुल वैसा ही और गाल पिचके हुए हैं. मां छोटे क़द की है पर बेटे को देखकर लगता है कि बड़ा होगा तो बढ़ेगा. सुबह मां के साथ ही कोने में खड़ा होता है. गहरे नीले रंग की हाफ पैंट और कभी-कभी उसी रंग की जींस पैंट में दिखता है. दो-तीन टीशर्ट बदल-बदलकर पहनता है और कभी-कभार वह क्रीम कलर की कॉलर वाली शर्ट पहने भी दिखता है. खड़े-खड़े जब उसका मन उचटता है तो गली में खेल रहे बच्चों के साथ मिलकर बैट-बॉल खेलने लगता है. यही कोई चौदह-पंद्रह साल का होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;मैंने उसके चेहरे पर आज तक कभी हंसी-खुशी जैसी कोई चीज भी महसूस नहीं की है. दुख भी नहीं. कोई भाव ही नहीं. अजीब रूप से उदासीन चेहरा जिसे मैं उकेरने में भले फेल हो जाऊं लेकिन मेरे मस्तिष्क में उसकी तसवीर बिलकुल स्पष्ट है&lt;/blockquote&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मां जब भी गठरी उठाकर किसी का कपड़ा पहुंचाने जाती तो उसकी ड्यूटी होती दुकान की निगरानी करना. और जैसे ही मां आती तो उसे कहती, 'जा खेल ले, यहां मत खड़ा हो.' वह चुपचाप सुनता और थोड़ी देर बाद वहां से खिसक जाता. वह लड़का भी मुझे उदासीन-सा लगता है. अवसादग्रस्त. खुशी और हंसी से दूर, किसी हीन-भावना से ग्रस्त.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर दिन की तरह उस दिन भी मैं श्रवण जी की दुकान के सामने लगे बेंच पर बैठा चाय सुरक रहा था. अपनी आदत से लाचार कभी गुज़रते हुए बच्चों को देखता, कभी दादा जी की उमर के आदमी को बिना मतलब मां-बहन करते हुए गुज़रते देखता, कभी वहीं बगल में सब्जी और अखबार की मिली-जुली दुकान का काउंटर सभाले बैठी छोटी और प्यारी-सी उस लड़की को देखता (जो दुकानदारी में बिल्कुल प्रौढ़ हो चुकी है), तो कभी आगे से गुज़र रहे लड़कों, लड़कियों को नोटिस करता. और घूम-फिरकर उस इस्त्री वाली महिला के पास पहुंच जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक भाई साहब उस इस्त्री वाली दुकान पर कपड़ों का एक गट्ठर लेकर आए. और चौपाये तख्ते पर अपना बोझ हल्का कर लिया. 'पांच शर्ट, पांच पैंट', भाई साहब ने कहा. बोली से मैंने अंदाज़ा लगाया, शायद बिहारी थे. जवाब आया, 'ठीक है.' अगला सवाल, 'कब तक हो जाएगा.' 'शाम तक', नपा-तुला अनुमानित जवाब.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाई साहब कुछ ज़्यादा ही सामाजिक थे. जाते-जाते कोने में खड़े बच्चे पर नज़र पड़ी. उन्होंने महिला से पूछा, 'आपका बेटा है?' इस्त्री वाली महिला ने हामी भरी. साहब ने अभिभावकीय अंदाज़ में हल्की-सी डांट के साथ उस बच्चे को कहा, 'मां को हाथ क्यों नहीं बंटाता, काम सीख लेगा तो तेरी मां को आराम होगा और कमाई भी बढ़ेगी.' बच्चे ने नज़रें नीची कर ली. वही हीन भावना और अवसाद मुझे उसके चेहरे पर फिर से दिखा था. मां ने तुरंत जवाब दिया, 'साहब, हम इस्त्री करने का काम करते हैं तो क्या हमारा बच्चा भी यही करेगा? हम उसे पढ़ा रहे हैं, उसे यह सब नहीं करना है.' बच्चे की तरफ़ देखते हुए मां ने कहा, 'जाओ बेटा, यहां मत खड़े रहो.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद आया मुझे कि बचपन में जब मुझे पहली बार यह समझ आया था कि मेरे बाबूजी बस के मालिक नहीं बल्कि कंडक्टर हैं तो ऐसी ही हीन-भावना के चपेट में मैं भी था. हालांकि वह ज़्यादा वक्त तक टिक नहीं पायी, शायद इस वजह से कि मुझे वह सारी सुविधाएं मिली जो किसी सामान्य मध्यवर्गी परिवार के बच्चों को मिलती हैं. इस्त्री वाली महिला भी उसी कवायद में लगी है और शायद अपने बच्चे को सुरक्षा-भाव दिलाने की चुनौती ही उसके चेहरे पर हंसी-खुशी का भाव नहीं आने देती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;(इलेस्ट्रेशन वीरेन्द्र शर्मा के ब्लॉग पॉइंट ऑफ़ व्यू  से लिया गया है)&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-2845796508703570911?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/2845796508703570911/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/2845796508703570911'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/2845796508703570911'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='इस्त्री वाली महिला'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-Qe-nEUCxluo/TbxFZoEzklI/AAAAAAAAAKw/vDJeC9QFxS8/s72-c/maa.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-2134985807075334237</id><published>2011-01-05T04:59:00.000-08:00</published><updated>2011-01-05T05:01:39.089-08:00</updated><title type='text'>स्त्रीवाद: संदेह और पूर्वाग्रहों का महत्व</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/TSRrpmBLv4I/AAAAAAAAAKQ/wgjBJXM8o_o/s1600/vks%2Bart-%2B1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 281px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/TSRrpmBLv4I/AAAAAAAAAKQ/wgjBJXM8o_o/s400/vks%2Bart-%2B1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5558686202406354818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;स्त्रीवाद तार्किक है और सही है. शायद इसलिए आकर्षक, प्रभावी और बौधिक भी लगता है. एक समाज जो हजारों साल से पुरुष प्रधान और पितृ सत्तात्मक रहा है, वहां आजकल नौजवानों-नवयुवतियों का स्त्रीवादी रुझान वाकई आशातीत है, लेकिन यह मान लेना कि चीज़ें वाकई बदल गई हैं या बदल रही हैं, शायद बहुत जल्दबाजी होगी. कई संयोगों और प्रयोगों से सामना होना बाक़ी है. कई आश्चर्यजनक, सुखद और दुखद संदर्भों से दो-चार होना बाक़ी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्त्री-विमर्श से कोई स्त्री-पुरुष जितना बौधिक दिखता है, सही मायनो में स्त्रीवाद को अपनाने के बाद उतना ही खड़हूस (स्त्री) और वैरागी (पुरुष) दिखेगा. वो इसलिए कि एक फ़ैमिन्स्ट स्त्री को मैन-हेटर तो नहीं होना चाहिए लेकिन शंकालू ज़रूर होना चाहिए (क्यों, ये आगे समझाने की कोशिश करूंगा) ऐसे में उसे सामान्य तौर पर खड़हूस ही माना जाएगा. उसी तरह स्त्रीवादी पुरुष जब स्त्री स्वतंत्रता और सम्मान की बात करेगा तो यह किस्सा दुनिया से शुरू होकर उसके घर नहीं, बल्कि उसके घर से शुरू होकर दुनिया में जाएगा, और बेहद स्पष्ट है कि जो पुरुष अपनी मां, बहन, पत्नी और प्रेमिका की स्वतंत्रता और उनके आक्रोश को सहजता से लेगा, समझेगा, उसे यह समाज वैरागी, निर्मोही या पागल तक करार देगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय समाज के हजारों साल से चले आ रहे अंध-अनुशासन और वाहियात तंत्र की आदत हमें बुरी तरह लगी है. इससे निकल सकना बहुत कठिन है. ऐसे में महज विमर्शों के आधार पर किसी स्त्री-पुरुष का चरित्र गढ़ लेना संतुलित नहीं है. चर्चाओं और बहसों पर आधारित किसी व्यक्ति विशेष की सार्वजनिक छवि को सच मान लेना खतरनाक निष्कर्षों को जन्म दे सकता है. संदेह और पूर्वाग्रह जैसे नकारात्मक शब्दों का धरातली इस्तेमाल स्त्रीवाद को मजबूत करने के लिए बहुत जरूरी है. वरना जाने-अंजाने बहुत बड़ा धोखा खाना पड़ सकता है. ऐसे संदेहों और पूर्वाग्रहों के माकूल तर्क हैं जिन्हें आसानी से समझा जा सकता है. असंदिग्ध सिर्फ पत्थर ही हो सकते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ये नहीं कहता कि अमुक आदमी या औरत दोगला है, अपनी ही बातों पर सही नहीं उतरता, भरोसे के काबिल नहीं है, क्योंकि ऐसा कहना उस प्रयास का मज़ाक़ उड़ाना हो जाएगा जो वह व्यक्ति विशेष स्त्रीवाद की दिशा में बढ़ने के लिए कर रहा है. असल में हम बचपन से ही ऐसे तंत्र में घिरे हैं जिनने हम पुरुषों को भोगी और स्त्रियों को योगी बना रखा है. योगी से मेरा मतलब समर्पिता का है. कुछ गिनती के घरों को छोड़ दें और बहुलांश में बात करें तो बेटियों को समपर्ण और निर्भरता का पूरा प्रशिक्षण दिया जाता है जैसे- किचन में मां का हाथ बंटाते बड़ी होती हैं, स्कूल में बड़े भाई के डॉन होने या किसी लड़ाके लड़के दोस्त की वजह से आश्वस्त रहती हैं कि कोई उन्हें छेड़ेगा नहीं, दो भाइयों में जिस तरह का द्वेष, ईर्ष्या, और स्पर्धा एक घर में दिखती है वैसा अमूमन एक भाई-बहन के बीच नहीं दिखता (सकारात्मक है लेकिन इसके भी अपने दुष्प्रभाव हैं), शादी के बाद पति के घर में रहना, अपने मां-बाप से दूर, उनके परिवार को अपनाना आदि. वहीं बेटों को सत्ता संभालने और भोग करने का प्रशिक्षण मिलता है जैसे- बना-बनाया भोजन, साफ बिस्तर, धुले कपड़े… उन्हें खुद मिहनत नहीं करनी पड़ती, उनके घर से देर तक बाहर रहने पर कम ही सवाल उठते हैं. कम शब्दों में कहूं तो कथित नैतिक जिम्मेदारियों का बोझ स्त्रियां उठाती है और भौतिक जिम्मेदारियां घर के पुरुष उठाते हैं. तो इस तरह एक पक्षपातपुर्ण अनुशासन जिसमें हम अपनी लगभग आधी ज़िंदगी गुजार चुके हैं, वो भी जीवन का वह हिस्सा जहां सीखने और उनमें ढलने की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है, को बदल देना मुश्किल है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-2134985807075334237?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/2134985807075334237/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/2134985807075334237'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/2134985807075334237'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='स्त्रीवाद: संदेह और पूर्वाग्रहों का महत्व'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/TSRrpmBLv4I/AAAAAAAAAKQ/wgjBJXM8o_o/s72-c/vks%2Bart-%2B1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-8538735734639252762</id><published>2010-08-23T23:15:00.000-07:00</published><updated>2010-08-23T23:18:46.618-07:00</updated><title type='text'>वो लड़की…</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/THNkIMdInxI/AAAAAAAAAJs/T0esn2J7BzQ/s1600/children-1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/THNkIMdInxI/AAAAAAAAAJs/T0esn2J7BzQ/s200/children-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5508856861149404946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वो लड़की कौन है, उसका नाम क्या है, क्या करती है, कहां रहती है… कुछ भी पता नहीं. पता है तो बस इतना कि वो एक नेक-दिल लड़की है.&lt;br /&gt;दिल्ली के बाराखंबा मेट्रो स्टेशन पे बैठा मैं अपनी एक दोस्त का इंतज़ार कर रहा था जब वो लड़की आगे से निकली थी. काले रंग का टॉप, उसी रंग की कैप्री, और गहरे ग्रे कलर की बैग लिए जा रही थी वो. थोड़ी मोटी, थोड़ी सांवली थी. वो ग्रुप में थी. उसके साथ जा रहे थे चार लड़कियां और पांच लड़के. असल में उसके साथ जा रही थी – ग़रीबी, भूख, प्यास, आस और चंद सूखे चेहरे. सबकी उमर सात से बारह बरस के बीच की होगी. सब अभाव-ग्रस्त अभागे थे. ल़ड़कों का शर्ट चाहे जिस भी रंग का रहा हो – उजला, हरा, पीला या नीला…. सब एक ही रंग में रंग चुका था. मटमैला. सबकी पैंट बेसाइज़ थी. किसी के पैर में चप्पल नहीं था. लड़कियों ने जो कुछ पहन रखा था वो भी किसी की खैरात ही जान पड़ती थी. सबके बाल बिन तेल, बिन शैम्पू भूरे और रूखे थे. सबका चेहरा धूल और माटी की थपेड़ खा-खा कर काला हो चुका था. पर फिर भी सबके चेहरे पे खुशी थी… उस एक लड़की की वजह से.&lt;br /&gt;ऐसा कौन सा मंतर फूंका था उसने. कुछ भी नहीं. कुछ पैसे दिए होंगे या कुछेक टॉफ़ियां. या फिर आइसक्रीम खिला दी होगी. क्य सिर्फ़ इतना ही. नहीं. उन्हें देखते ही वो बाक़ियों की तरह मुंह बनाकर दूसरी तरफ़ घूमी नहीं होगी. चेहरे पर उसके घृणा वाला भाव नहीं आया होगा. उन्हें डांट कर उसने भगाया नहीं होगा बल्कि उनसे बात की होगी. उसने अपने वक़्त में से दस मिनट निकाला होगा. उनसे अच्छी-अच्छी बातें की होगी. उनके हाथ में हाथ डालकर उनके सपने को जीया होगा शायद!! या फिर उन्हें जिलाने की कोशिश की होगी.&lt;br /&gt;मैंने देखा था जब वो बस स्टैंड पर थी. वो सबको गले लगा रही थी. कुछ को चूमा भी. शायद ये उसके जाने का वक़्त था पर जो खुशी वो उन आंखों में छोड़ गयी थी वो क्या कम था. मैं बस देखता रह गया. बच्चे बिखर चुके थे. कुछ इधर. कुछ उधर. लड़की जा चुकी थी.&lt;br /&gt;सर्वणा भवन में बैठ कर जब डोसा तोड़ रहा था, सांवर-वाडा का मज़ा ले रहा था, कॉफ़ी की चुस्की के साथ अपनी दोस्त से बातें कर रहा था तो मैं बस उसके साथ नहीं था. मेरा ध्यान उस लड़की और उन बच्चों पर भी था. मैं बंटा हुआ था. सोच रहा था – काश इस तरह.. कुछ पल की खुशी… कुछ नाउम्मीद बच्चों को… मैं भी दे सकता!! पर मैं तो एक संवेदनहीन और निष्क्रिय भीड़ का हिस्सा हूं. देखता हूं. सोचता हूं. भूल जाता हूं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-8538735734639252762?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/8538735734639252762/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/08/blog-post_23.html#comment-form' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/8538735734639252762'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/8538735734639252762'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/08/blog-post_23.html' title='वो लड़की…'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/THNkIMdInxI/AAAAAAAAAJs/T0esn2J7BzQ/s72-c/children-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-7009868586903675361</id><published>2010-06-28T08:50:00.000-07:00</published><updated>2010-06-28T08:56:22.944-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='woman impowerment'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='crime against woman'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='woman in india'/><title type='text'>आधी आबादी का सच</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://mi9.com/datawallpapers/data/22/1932/1235455465/untouchable-woman-in-india_1024x768.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 210px; height: 157px;" src="http://mi9.com/datawallpapers/data/22/1932/1235455465/untouchable-woman-in-india_1024x768.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ये है भारत की भयावह तस्वीर.&lt;/span&gt; हर तीन में से एक औरत अपने 15 से 49 वर्ष तक की अवस्था में होती है यौन उत्पीड़न या शारीरिक शोषण का शिकार. हर सात में से एक शादीशुदा औरत होती है पति के हाथो हिंसा का शिकार. हर रोज़ भारत में होता है औसत से सात हज़ार लड़कियों का जन्म. एक हालिया सर्वे के मुताबिक दिल्ली के मूलचंद अस्पताल में 2005-2007 में हज़ार लड़कों की तुलना में हुआ महज 514 लड़कियों का जन्म. आंकड़ा सरकारी होने पर इतना भयावह है तो असलियत होगी कितनी अमानवीय!!&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;नेशनल क्राईम ब्यूरो की रिपोर्ट&lt;/span&gt; बतलाती है कि साल 2008 में भारत में महिलाओं के उपर हुए ज़ुल्म के क़रीब दो लाख मामले दर्ज हुए. मामला बलात्कार, दहेज के लिये की गयी हत्या, घरेलू हिंसा वगैरह-वगैरह से संबद्ध था. केवल बलात्कार के बीस हज़ार मामले ऐसे थे जिसमें बलात्कारी अपना ही कोई सगा-संबंधी था. मसलन चाचा, मामा, फूफा, भाई, बाप. इन आंकड़ों में ढाई हज़ार ऐसे मामले दर्ज़ हैं जिसमें 15 वर्ष से कम उमर की बच्चियों का बलात्कार हुआ है जिन्हें असल में बलात्कार का मतलब भी पता नहीं होगा. क्या उन हरामियों को उस बच्ची की चीख में अपनी किसी बहन या बेटी का चेहरा नहीं दिखा!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बड़े शहरों के बारे में&lt;/span&gt; यह आम धारणा होती है कि वहां की स्थिति छोटे शहरों और गांवों से बेहतर होगी लेकिन महिलाओं पर हो रहे अपराधों में इस तरह की धारणा पालना बहुत बड़ी बेवक़ूफ़ी है. भारत की आबादी क़रीब एक अरब 15 करोड़ है जिसमें दस करोड़ लोग महानगर से आते हैं. अकेले 2008 में देश भर से आये क़रीब दो लाख मामलों का दस फ़ीसदी बड़े शहरों से आये हैं. सरकारी रिपोर्ट तो बस वैसे मामलों का ब्योरा है जो थाने की दहलीज़ तक पहुंच पाते हैम वरना लाखों तो घर की चौखट पर ही दम तोड़ देते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विकास और व्यवहारिकता&lt;/span&gt; को सीधे-सीधे अशिक्षा से जोड़ देने का बहाना भी निरुपमा की मौत के साथ खत्म हो गया. उसके परिवार में न तो कोई अशिक्षित था न ही वो पिछड़े लोगों में से थे. ऑनर किलिंग का मामला अब सिर्फ़ किसी पिछड़े गांव या तबके से नहीं बल्कि शहरों से भी आता है. अभी कुछ दिन पहले ही तो दिल्ली में तीन घंटे में तीन हत्यायें सिर्फ़ इसी वजह से हुई. और तो और बाप अपनी बेटी के क़ातिल यानी कि अपने हत्यारे बेटे का बढ़-चढ़ कर पक्ष ले रहा है. जब तक ऐसे हरामी बाप-भाई हैं तब तक कोई औरतों के आगे बढ़ने का कोई दिवा स्वप्न भला देखे भी तो कैसे!! याद रहे.. ये उसी हिन्दू धर्म की दुहाई देते हैं जिसका कृष्ण रुकमिणि को भगाकर कर शादी करता है, जिसकी कुन्ती बिन ब्याहे कर्ण जैसे शूरवीर को जन्म देती है, जिसका हनुमान खुद को कह्ता तो ब्रहमचारी है पर एक बेटे का बाप है, जिसका लक्षमण बेवजह शूर्पनखा का नाक काट देता है. असल में भारतीय समाज हमेशा से ही स्त्री-विरोधी और घोर पुरुषवादी रहा है फिर चाहे वो हिन्दू हो, मुस्लिम हो, सिख हो या इसाई हो. सारे नियम, सारे क़ायदों का बोझ निरुपमा या उस जैसी हज़ारों-लाखों लड़कियां ही क्यों ढोये?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लैंगिक भेदभाव को लेकर &lt;/span&gt;165 देशों पर रिसर्च हुआ और भारत को 115 वां स्थान मिला. संयुक्त राष्ट्र ने शिशु और मातृत्व सुरक्षा पर एक रिपोर्ट ज़ारी की है. इस अध्ययन के अनुसार 77 मध्य आय वालों देशों में इस समय भारत का स्थान 73 वां है. दुनिया भर के जिन बारह देशों में गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं, और नवजात शिशुओं की मौत सबसे ज़्यादा होती है, भारत उनमें से एक है. यानी कि जिस संस्कृति के धनी देश भारत में महिला को देवी का दर्ज़ा दिया गया है वही देश मां बनने के लिये सुरक्षित नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दिल्ली, मुंबई या बैंगलोर&lt;/span&gt; जैसे महानगरों में किसी मल्टी नेशनल कंपनी के बड़े फाटक से निकलती हुई अकोर्ड की चमचमाती हुई गाड़ी और उसके स्टेयरिंग को थामे हाथ जब किसी लड़की के होते हैं तो लगता है हिन्दुस्तान बदल रहा है. इंडिया गेट की सड़क पर सुबह सुबह बुलेट चलाती कोई लड़की हवा से बात करते हुए जब बगल से निकलती है तो लगता है हिन्दुस्तान बदल रहा है. पर ये असल में फटी हुई किताब में लपेटी हुई नयी जिल्द भर है. भारत में सात से चौदह वर्ष तक के ऐसे बच्चों की कुल आबादी क़रीब पांच करोड़ है जिनका किसी स्कूल में नामांकन नहीं होता. इनमें पचपन प्रतिशत लड़कियां हैं. बीते एक अप्रैल से बहाल ’राईट टू एजूकेशन’ किस काम का रह जायेगा अगर ऐसी करोड़ों लड़कियां किसी स्कूल तक पहुंच ही न पायें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;’नेशनल कमीशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चिलड्रन्स राईट्स’&lt;/span&gt; की एक रिपोर्ट बतलाती है कि भारत में छ से चौदह साल तक की ज़्यादातर लड़कियों को हर रोज़ औसतन आठ घंटे से भी ज़्यादा समय केवल अपने घर के कामों में बिताना पड़ता है. मसलन झाड़ू-पोंछा, छोटे बच्चों को संभालना, खाना पकाना वगैरह वगैरह. सरकारी आंकड़ों को लेकर ही आगे बढ़ें तो जहां छ से दस साल तक की 25 प्रतिशत लड़कियां स्कूल से ड्रॉप-आऊट होती हैम वहीं दस से तेरह साल की लगभग पचास प्रतिशत लड़कियों को पढ़ाई के दौरान स्कूल छोड़ना पड़ता है. साल 2008 में कराये गये एक सरकारी सर्वेक्षण में 42% लड़कियों ने बताया कि उन्हें स्कूल अपने मां-बाप के दबाव की वजह से छोड़ना पड़ता है ताकि वो घर का काम-काज संभाल सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भारत में महिलाओं की संख्या&lt;/span&gt; कुल आबादी का 48.26% है. इनमें से 44.2% महिलाऒम को वोटाधिकार प्राप्त है. इतनी बड़ी वोटिंग आबादी के बावुजूद भी लोकसभा में सिर्फ़ 9.2% महिला प्रतिनिधि हैं, जबकि राज्यसभा में इनका प्रतिशत महज 8.6% है. इसको विडंबना ही कहेंगे कि भारत के कुल 32 केंद्रीय मंत्रालयों में सिर्फ़ दो ही महिला के हाथों में है. ममता बनर्जी के हाथ में रेल है और अंबिका सोनी संभालती है सूचना और प्रसारन मंत्रालय. इनके अलावा छ महिलायें राज्य मंत्रालय संभालती हैं. बस. लोकसभा की कुल 542 सीटों में महिलाऒं की हिस्सेदारी महज 42 सीटों पर है. राज्यसभा के 242 सीटो में सिर्फ़ 28 स्त्रियां हैं. संसद में महिलाओं के लिये जो 33% आरक्षण का हो-हल्ला आंधी की तरह राज्यसभा से पास होकर गुज़रा तो पर लोकसभा तक कब पहुंचेगा इसके कोई संकेत उपलब्ध नहीं हैं. सवाल बड़ा साफ़ है कि अगर ये आरक्षण हो भी गये तो क्या महिलाऒं का स्थिति बद्दल जायेगी. बिहार में भी पंचायती चुनावों में महिलाऒं को आरक्षण मिला. पर इसका परिणाम ठीक वही हुआ जो ’वेलडन अब्बा’ में दिखाये गांव की सरपंच का हुआ था. इनकी भुमिका बस दस्तखत करने और मोहर लगाने तक ही सीमित है. पदवी दिखती तो औरतों की है पर कब्ज़ा मर्दों का ही होता है. परिणाम यह होता है कि भ्रष्टाचार में लिप्त तो पति होते हैं पर जब भी ऐसे केस सामने आते हैं तो कानून के शिकंजे में औरत ही फंसती हैं चुंकि काग़ज़ पर जन-प्रतिनिधि तो वही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भारत भले ही आज़ाद हो&lt;/span&gt; पर असल में यहां की आधी आबादी अब भी गुलाम है. तो क्या अगर इस राष्ट्र की तीनों सेना एक महिला कमांडर के हाथों में है. तो क्या अगर इस देश का मंत्री मंडल एक महिला के इशारों का मोहताज है. तो क्या अगर इस देश की राजधानी और यहां के सबसे बड़े राज्यों में से एक ऊत्तर-प्रदेश की कमान एक स्त्री के हाथों में है. ऐसे नजाने और कितने उदाहरण हैं जो सिर्फ़ अपने मतलब की रोटी सेंकने में ही यक़ीन रखते हैं. एक महिला और बाल विकास मंत्रालय का गठन हुआ था लेकिन वो सिर्फ़ हाथी-दांत बनकर ही रह गया है जिसके आने से न तो अपराध कम हुए न ही विकास का दर बढ़ गया.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-7009868586903675361?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/7009868586903675361/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html#comment-form' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/7009868586903675361'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/7009868586903675361'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html' title='आधी आबादी का सच'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-2964737246149809410</id><published>2010-06-05T07:15:00.000-07:00</published><updated>2010-06-05T07:23:04.186-07:00</updated><title type='text'>अधर्म के ढांचे में बसा हुआ धर्म</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.hinducounciluk.org/newsite/crcimages/swastikacol2.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 204px;" src="http://www.hinducounciluk.org/newsite/crcimages/swastikacol2.gif" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज यहां सब विराजमान हैं. राधा, कृष्ण, राम, जानकी, लक्ष्मण, हनुमान (एक छोटा हनुमान राम के चरणों में, एक बड़ा हनुमान पहाड़ और गदा लिये अकेला), और कैलाशपति भोलेनाथ. अकेले भोलेनाथ को सबसे ज़्यादा ज़मीन दी गयी है, हड़प कर. शिव जी, बजरंगबली और श्रीराम अपने परिवार सहित नजाने कब से इस सरकारी स्कूल के आगे सड़क बनाने के लिये आबंटित ज़मीन पर जमे हुए हैं. ये ज़मीन जहां तक मेरा अनुमान है स्टेट बोरिंग की ज़मीन थी जहां शायद बाद में सड़क बनती.    &lt;br /&gt;खैर, जब मैं यहां बसा था उस वक्त ये मंदिर अस्तित्व में थे लेकिन प्रेम-प्रतीक राधे-कृष्ण का घर मेरे बाद बना था. या यूं कहें कि लगभग साथ-साथ बना था. फ़र्क़ बस इतना था कि मेरे बाबू जी को ज़मीन ख़रीदने और घर बनाने में लाखों रुपये लग गये और कृष्ण अपने लिव इन पार्टनर के साथ बिल्कुल मुफ़्त में आकर बसे. जितनी सरल और प्यारी मुस्कान इन तमाम प्रतिमाऒं के चेहरे पर बिखरी हुई है उससे भी ज़्यादा कुटिल चालों से इंसान इन्हें यहां बसा गया.&lt;br /&gt; बेगुसराय ज़िले में है बरौनी रिफ़ायनरी, टाउनशिप. इसके पूर्वी दिशा में एक गांव है, इटवा. इटवा के बाद पिपरा. और पिपरा के बाद न्यू दिनकर नगर प्रोफेसर्स कॉलोनी. ये तीनों जगह टाउनशिप के पूर्वी बाउंड्री वॉल के साथ साथ लगी हुई है. बाउंड्री से सटी हुई गांव की तरफ़ की क़रीब १८ फ़ीट ज़मीन पर चल रह विवाद थम चुका था और रिफ़ायनरी ने ये केस जीत लिया था. कुछ लोग खुश थे कि रिफ़ायनरी ये ज़मीन कब्ज़े में करेगी तो अच्छा ही होगा, कम से कम लाइट लग जायेगी तो लोग रात को डरेंगे नहीं. छोटे मोटे छीन-छोड़ की घटना कम होगी. लेकिन यहां पर बसे दो-चार दबंगों के लिये दिक्कत की बात यह थी कि अगर उस ज़मीन पर रिफ़ायनरी ने अपना कब्ज़ा कर लिया तो वो गाय कहां बांधेंगे! गोबर कहां जमा करेंगे! गोयठा कहां ठुकवायेंगे! छोटी-मोटी सब्जियां कहां उगायेंगे! जहां सब कुछ फ़्री में मिल रहा है वहां अपनी ज़मीन का इस्तेमाल किया तो कट्ठा-दो कट्ठा तो लग ही जायेगा. &lt;br /&gt;उस सुबह जब सायकल लेकर बाजार की ओर निकला तो पिपरा में वहां एक झोपड़ बना था जिसमें पत्थर के कुछ टुकड़े पड़े थे. कुछ लोग अगरबत्ती लेकर पूजा-पाठ भी कर रहे थे. बाजार जाने के लिये मुझे हमेशा उसी रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ता है. जब शाम को दोबारा उधर से गया तो देखा कि वहां पर ईंट, छड़, बालू, गिट्टी, सीमेंट ज़मा किये जा रहे हैं. उधर से जितने भी ट्रैक्टर जाते उसे रोककर, ड्राइवर को ज़बरदस्ती डरा धमकाकर, और जहां बात न बने वहां लपड़ाकर ये चीज़ें जुटायी गयी थी. पत्थर के उन टुकड़ों के चारो ओर रातो-रात पीलर ढाल दिये गये. छत की ढलायी हो गयी. सुबह जब निकला तो देखा कि ईंट जुड़ायी का काम चल रहा है. इतनी तेज़ गति से किसी काम को देखने का यह मेरा पहला अनुभव था. २४ घंटे के अंदर रिफ़ायनरी की ज़मीन पर एक ऐसा ढांचा तैयार था जिसे तोड़ने के नाम पर ही मार-काट शुरु हो जाती है. मंदिर बनकर तैयार हो गया. अब दूर-दूर तक उपवन लगने लगे. मंदिर दिनो-दिन अपना दायरा बढ़ा रहा है. पत्थर के टुकड़े मुर्तियों से रीप्लेस कर दिये गये हैं. मिट्टी की ज़मीन मार्बल में बदल दी गयी. सीमेंटेड दीवारें टाइल्स से चमचमाने लगी. &lt;br /&gt;मेरी मां हर साल अलग-अलग मौसम में वहां बसे सारे भगवान को कपड़े सिलकर देती है. ठंड के मौसम में उनके लिये कश्मीरी शॉल, गरमी में मलमल का कुर्ता और ए-ग्रेड की पीतांबरी सिली जाती है. ये बात और है कि हर साल उसी गांव में कितने बूढे ठंड से ठिठुरकर मरते हैं. उसी गांव में दलितों के बच्चे को आज भी मां की गाली से ही संबोधित किया जाता है. उसी गांव में कितने लोग उस टाट के नीचे सोते हैं जहां धूप में सूरज घुस जाता है और बारिश में टप-टप करता हुआ पानी वहां रहने वालों को सताता है. काश ट्रैक्टर वालों को डरा-धमकाकर ईंट और छड़ छीनने वाले तथाकथित दबंग इनलोगों के लिये अधार्मिक शैली में ही सही एक डिस्को छप्पर भी लगवा देते तो आज मेरी कलम उन्हें ग़लत न ठहराती.&lt;br /&gt;पिपरा से भी ज़्यादा कुराफ़ात तो ईटवा के उस इलाक़े में हुआ है जिसे गांववालों ने जगदेव बाबा के नाम पर हड़प कर रखा है. ये क़रीब २-३ कट्ठा ज़मीन है जिसमें मालदह आम के क़रीब १०-१५ पेड़ लगे हुए हैं. ये ज़मीन भी रिफ़ायनरी की है. यहां पे जब जब रिफ़ायनरी वाले अपनी बाउंड्री खड़ी करते हैं, गांव वाले चौकीदार को कुछ पैसे देकर ढाह देते हैं और कहानी मढी जाती है कि फ़लां-फ़लां बाबा को घेरने पर रिफ़ायनरी की बाउंड्री अपनेआप ढह गयी. ५-६ कोशिशों के बाद अब रिफ़ायनरी ने भी उकता कर छोड़ दिया है. कुछ लोगों की ऐश हो गयी है. उसी बाबा के पड़ोस में और आम के पेड़ की छांव में तशेरियों का अड्डा बना हुआ है. भूसे का कारोबार और गिट्टी, बालू का कारोबार भी रिफ़ायनरी की ज़मीन पर धड़ल्ले से चलायी जा रही है. और जगदेव बाबा इन सबको प्रश्रय दे रहे हैं.&lt;br /&gt;एक बात साफ़ कर दूं. मैं रिफ़ायनरी का हितैषी नहीं हूं न ही गांव वालों से मेरी दुश्मनी है. रिफ़ायनरी बेगुसराय में बहुत धुआं फैलाती है. लेकिन उसने बहुत सारे पेड़ भी लगाये हैं. बहुत लोग वहां मज़दूरी कर अपना पेट भी पालते हैं. रिफ़ायनरी का सायरन मक्सिम गोर्की के द्वारा लिखे ’मां’ की याद दिला जाता है. लेकिन रिफ़ायनरी मज़दूरों के साथ कम से कम वैसा व्यवहार नहीं करती जैसा मिल-मालिकों का इतिहास रहा है. गांव के दबंग भुमिहार या पंडित जो भले ही बहुत पैसे वाले न हों लेकिन उनके शोषण का तरीका और भी अमर्यादित और शर्मसार कर देने वाला है. वो भगवान के लिये ढांचे खड़े करवाने वक्त तो डोम और मुसहर से भी ईंट ढुलवायेंगे लेकिन बाद में उन्हीं को मंदिर में पैर रखने से रोक देंगे. वो यज्ञ करवाने के लिये चंदे तो वहां से ज़रूर लेंगे लेकिन अगर उस यज्ञ का कलश कोई दलित उठाना चाहे तो मार-पीट कर उसे रोक देंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-2964737246149809410?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/2964737246149809410/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/2964737246149809410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/2964737246149809410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='अधर्म के ढांचे में बसा हुआ धर्म'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-4379224649192566624</id><published>2010-05-27T22:14:00.000-07:00</published><updated>2010-05-27T22:16:13.617-07:00</updated><title type='text'>इंसान कैसे रंग में... लिपा-पुता सा है</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.islamicvoice.com/march.2002/images/new-gujrat-6.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 434px; height: 283px;" src="http://www.islamicvoice.com/march.2002/images/new-gujrat-6.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोड़ा-पत्थर सा यहां बिखरा पड़ा सा है,&lt;br /&gt;हाथ कुछ और पैर... कुचला दबा सा है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ून का छींटा कहीं और अश्क की दरिया,&lt;br /&gt;परिजन किसी का लाश से लिपटा हुआ सा है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है कौन हिन्दू, और मुस्लिम, ढूंढ के बतला,&lt;br /&gt;अल्लाह तेरा और राम भी... दुबका-छुपा सा है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिहाद या फ़साद है, है राम या हराम है,&lt;br /&gt;इंसान कैसे रंग में... लिपा-पुता सा है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मुल्क मुल्कों से भरा, है सरहदों में सरहदें,&lt;br /&gt;दोस्त तेरा देश कितना….. बंटा-बंटा सा है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-4379224649192566624?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/4379224649192566624/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/05/blog-post_8202.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/4379224649192566624'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/4379224649192566624'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/05/blog-post_8202.html' title='इंसान कैसे रंग में... लिपा-पुता सा है'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-6114934039034305612</id><published>2010-05-27T02:09:00.000-07:00</published><updated>2010-05-27T02:17:52.900-07:00</updated><title type='text'>शांत, शिथिल और अमिट चेहरे</title><content type='html'>बेगुसराय में किराये के मकान में रहते थे हम. न्यू दिनकर नगर प्रोफेसर्स कॉलोनी में. लाल पगड़ी बांधे आता था वो. चमकती हुई सफ़ेद मूछ और दाढ़ी में लिपटा था उसका चेहरा. एक हाथ में पीतल की कमंडल होती थी. दूसरे में लाठी. साल दर साल बीते. सिवाय चंद झुर्रियों के उसके चेहरे में कुछ और बदला नहीं उन आठ-दस सालों में. उसके मुंह से सिर्फ़ एक ही रट सुनायी देती थी – ’शंभू-शंभू’. उसका नाम मुझे नहीं पता था. दाल, चावल, आटा, रोटी, आलू कुछ भी दे दो उसे. खुशी से निकलते थे उसके पीले दांत, सफ़ेद दाढी और मूछों के बीच से. थोड़ा सा सफ़ेद होता दांत तो शायद फ़रक़ ही नहीं कर पाते कि दांत है या दाढ़ी. उसका आशीर्वाद भी लगता था रटा-रटाया सा – “लक्ष्मी मिले, धन मिले, विद्या मिले, बुद्धि मिले, बाल-बच्चा पढ़ लिख-कर कलेक्टर बने.” जिस दिन ’शंभू-शंभू’ की आवाज़ कानों के दरवाज़े नहीं खटखटाती, लगता था कुछ छूट रहा है. उसके चेहरे पे हमेशा एक ही भाव होता था. कोई बदलाव नहीं. चाहे आप कुछ दें या न दें. बाबा कहके उनकी इज़्ज़त करें, या उनको गरिया लें. वो बस मुस्कुराते ही रहते थे. वो मुस्कुराहट या तो फ़ेक थी या फिर फ़ेवीकॉल से चिपका दी गयी थी उसके चेहरे पर. अगर मैं एक अच्छा चित्रकार होता तो उसकी तस्वीर ज़रूर उकेड़ देता क़ागज़ पर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुनिरका से बाहर निकलने के लिये अनुपम रेस्तरां की तरफ़ आता हूं. वहां एक औरत अपने बोरिया-बिस्तर के साथ मिलती है २४ गुना ७. दिखने में वो भद्दी है. उसके बाल बिल्कुल उलझे हैं. उजले और सफ़ेद बाल आपस में मिल्कर ग्रे हो गये हैं. वो काली है. मोटी है. उसकी आंखे बिल्कुल सूखी है, निष्क्रिय हो जैसे. भावशून्य. वो हर रात उस दुकान के नीचे बनी सीढियों पे सोती है जिसके शटर पर वोडाफ़ोन का लोगो पुता है. और दिन में जैसे ही दुकान खुलने का वक़्त होता है.. अपना सारा बिस्तर सड़क के दूसरे किनारे पर लगा लेती है. जब भी गुज़रता हूं नज़रे दौड़ती है पहले शटर के नीचे और उसे वहां न पाकर सड़क के दूसरे किनारे. उसकी मांग में सिंदूर भी है. उसके हाथों में चूड़ियां भी हैं. पर कहां है उसका परिवार, पति और उसके बच्चे? मैनें उसे कभी खाते हुए नहीं देखा न ही उससे खाने को कभी पूछा. उसके पास एक पानी की बोतल ज़रूर है जिससे वो कभी अपना चेहरा धोती है, कभी प्यास बुझाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑफ़िस के बाहर एक छोटी सी मार्केट है. निकल के हमेशा जाता हूं वहां सुट्टा लगाने के लिये. वहां एक औरत है जो शायद मानसिक विकलांगता का शिकार है. गरमी हो या जाड़ा उसके तन पर एक मोटा ऊनी का शॉल ज़रूर होगा. उसकी साड़ी घुटनो तक ही होती है. पैर नंगे हैं. उसकी सरहद शायद इसी छोटे से मार्केट तक सिमटी हुई है. मैनें जब भी देखा है वो इसी मार्केट के अहाते में या तो चक्कर लगाते दिखी है, या कबूतरों के साथ बैठी दिखी है. कबूतर दाना चुग रहा है, वो उसे टुकुर-टुकुर देख रही है. वो कुछ लोगों को पुकारती है. उनसे टाइम पूछती है. फिर पता नहीं क्या बतियाती है. उसकी बातें मेरी समझ में नहीं आती. उसके बाल औरतों के टाइप की नहीं है. ऐसा लगता है किसी ने कैंची लेकर छपट दिया है ऐसे ही. उसके गाल हड्डियों से चिपके हुए हैं. दांत थोड़ा सा बाहर है. पर भावशून्यता यहां भी है. मैं क़रीब छह महीने से यहां हूं. मुझे उसके हुलिये में कोई बदलाव नहीं नज़र आया. हाथों में प्लास्टिक की थैली को वो अपने पास ऐसे रखती है जैसे जीवन की अरजी हुई सारी कमायी उसके अंदर हो. जब भी बाहर निकलता हूं तो एक बार नज़र दौड़ ही जाती है उधर उसे ढूंढने को. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ चेहरे पत्थर की लक़ीरें होती है. शांत, शिथिल और अमिट. कितना भी चाहो ज़ेहन से मिटती नहीं. उनसे कोई जान-पहचान नहीं होती. कोई परिचय नहीं होता. पर जब भी उस रास्ते से गुज़रें तो आंखे ढूंढने लगती है वो चेहरा. ऐसे कई चेहरे शायद आप भी याद करने लगे इसको पढ़ने के बाद…&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-6114934039034305612?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/6114934039034305612/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/05/blog-post_27.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/6114934039034305612'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/6114934039034305612'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/05/blog-post_27.html' title='शांत, शिथिल और अमिट चेहरे'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-1762892833766307375</id><published>2010-05-15T00:05:00.000-07:00</published><updated>2010-05-15T00:16:16.149-07:00</updated><title type='text'>सज़ा नहीं सुविधा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://static.josh18.com/pix/labs/sitepix/04_2009/2004_kasab.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 248px; height: 178px;" src="http://static.josh18.com/pix/labs/sitepix/04_2009/2004_kasab.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जो मरने के लिये ही आया है उसे मौत की सज़ा सुनाकर हम कौन सा तीर मार लेंगे. वो तो ग़नीमत है कि कसाब २६/११ को बच गया वरना वो कौन सा वापस पाकिस्तान लौट के हनीमून मनाने वाला था ! फ़ांसी की सज़ा सही मायनों में न तो कसाब जैसे अपराधियों में दहशत ही बना पायेगी, न ही इससे आतंकवाद की घटनायें कम होने लगेगी. उसे तो सारी उमर जेल में रखकर पत्थर तुड़वाये जाने चाहिये थे. बल्कि मेरा निजी राय तो ये है कि उससे सारी उमर जेल में बाक़ी क़ैदियों का जूठा बरतन साफ़ करवाना चाहिये. ऐसा होता तो लगता सज़ा मिली है. अभी तो लगता है जैसे कसाब की मुराद पूरी हुई हो. उसने तो बिल्कुल शुरुआत में ही अपना ज़ुर्म क़ुबूल कर लिया था यह जानते हुए भी कि इसका नतीज़ा सज़ा-ए-मौत हो सकती है. मतलब उसे न तो इसका डर था न ही फ़िकर. उसका मक़सद पूरा हो चुका था. ये सज़ा तो… लगता है सज़ा नहीं सुविधा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के वकीलों, सुरक्षा सलाहकारों और यहां की बहुत बड़ी आबादी का मानना है कि डेथ-सेंटेंस को जश्न के रूप में मनाना चाहिये. मेरा सीधा सवाल है – क्यों? कैसा जश्न जब हम एक अपराधी को उसके मक़सद की ओर भेजने में उसकी मदद कर रहे हैं. वो मरने के लिये आया है और हम उसे मार रहे हैं. वाह भई वाह!! मज़ा तो तब आता जब ’वांटेड’ सनीमा के उस डॉन की तरह इसे भी लगातार जगाया रखा जाता. उसके मरने की चाहत के खिलाफ़ हमें कसाब का हिसाब ज़िंदगी भर के नौकरपनी से करवानी चाहिये था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोगों पे तो बड़ी हंसी आती है. वो कहते हैं कि अगर इसे ज़िंदा रखा तो फिर कोई प्लेन हाईजैक करवा के इसे छुड़ा ले जायेगा. अजीब बात है. अपनी सुरक्षा पे भरोसा नहीं इसलिये फांसी पर चढ़ा दो. खैर अभी तो बहुत वक़्त है कसाब के पास.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-1762892833766307375?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/1762892833766307375/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/05/blog-post_15.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1762892833766307375'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1762892833766307375'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/05/blog-post_15.html' title='सज़ा नहीं सुविधा'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-691860917459883783</id><published>2010-05-01T06:21:00.000-07:00</published><updated>2010-05-01T06:29:04.439-07:00</updated><title type='text'>मैं मर्द हूं .... तुम  औरत..!!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S9wr2AmIrTI/AAAAAAAAAIk/jRPmkLNINVw/s1600/contact+men.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 311px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S9wr2AmIrTI/AAAAAAAAAIk/jRPmkLNINVw/s320/contact+men.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5466292254593822002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मैं भेड़िया, गीदड़, कुत्ता जो भी कह लो, हूं. मुझे नोचना अच्छा लगता है. खसोटना अच्छा लगता है. मुझसे तुम्हारा मांसल शरीर बर्दाश्त नहीं होता. तुम्हारे उभरे हुए वक्ष.. देखकर मेरा खून रफ़्तार पकड़ लेता हूं. मैं कुत्ता हूं. तो क्या, अगर तुमने मुझे जनम दिया है. तो क्या, अगर तुम मुझे हर साल राखी बांधती हो. तो क्या, अगर तुम मेरी बेटी हो. तो क्या, अगर तुम मेरी बीबी हो. तुम चाहे जो भी हो मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरी क्या ग़लती है? घर में बहन की गदरायी जवानी देखता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. तो तुमपर अपनी हवस उतार लेता हूं. घोड़ा घास से दोस्ती करे, तो खायेगा क्या? मुझे तुमपर कोई रहम नहीं आता. कोई तरस नहीं आता. मैं भूखा हूं. या तो प्यार से लुट जाओ, या अपनी ताक़त से मैं लूट लूंगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी तुम्हारी इतनी हिम्मत कहां कि मेरा प्रतिरोध कर सको. ना मेरे जैसी चौड़ी छाती है ना ही मुझ सी बलिष्ठ भुजायें. नाखून हैं तुम्हारे पास बड़े-बड़े, पर उससे तुम मेरा मुक़ाबला क्या खाक करोगे. उसमें तो तुम्हे नेल-पॉलिश लगाने से फ़ुरसत ही नहीं मिलती. कितने हज़ार सालों से हम मर्द तुमपर सवार होते आये हैं, क्या उखाड़ लिया तुमने हमारा? हर दिन हम तुम्हारी औक़ात बिस्तर पर बताते हैं. तुम चुपचाप लाश बनी अपनी औक़ात पर रोती या उसे ही अपनी किस्मत मान लेटी रहती हो. ताक़त तो दूर की बात है, तुममें तो हिम्मत भी नहीं है. हम तो शेर हैं. जंगल में हमे देख दूसरे जानवर कम से कम भागते तो हैं पर तुम तो हमेशा उपलब्ध हो. भागते भी नहीं. बस तैयार दिखते हो लुटने के लिये. कुछ एक जो भागते भी हो तो हमारे पंजों से नही बच पाते. पजों से बच भी गये तो सपनों से निकलकर कहां जाओगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले साल तुम जैसी क़रीब बीस बाईस हज़ार औरतॊं का ब्लाउज़ नोचा हम मर्दों नें. तुम जैसे बीस बाईस हज़ार औरतों का अपहरण किया. अपहरण के बाद मुझे तो नहीं लगता हम कुत्तों, शेरों या गीदड़ों ने तुम्हे छोड़ा होगा. छोड़ना हमारे वश की बात नहीं. तुम्हारा मांस दूर से ही महकता है. कैसे छोड़ दूं. क़रीब अस्सी-पचासी ह़ज़ार तुम जैसी औरतों को घर में पीटा जाता है. हम पति, ससुर तो पीटते हैं ही, साथ में तुम्हारी जैसी एक और औरत को साथ मिला लिया है जिसे सास कहते हैं. और ध्यान रहे ये सरकारी रिपोर्ट है. तुम जैसी लाखों तो अपने तमीज़ और इज्ज़त का रोना रोते हो और एक रिपोर्ट तक फ़ाईल करवाने में तुम्हारी…. फट जाती है. तुम्हारे मां-बाप, भाई भी इज्ज़त की दुहाई देकर तुम्हे चुप करवाते हैं और कहते हैं सहो बेटी सहो. तुम्हारे लिये सही जुमला गढ़ा गया है, “नारी की सहनशक्ति बहुत ज़्यादा होती है.” तो फिर सहो.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मर्द हूं और हज़ारों सालों से देखता आ रहा हूं कि तुम्हारी भीड़ सिर्फ़ एक ही काम के लिये इक्कठा हो सकती है. मंदिर पर सत्संग सुनने के लिये. तो क्या अगर तुम्हारा रामायण तुम्हे पतिव्रता होना सिखाता है. मर्दों के पीछे पीछे चलना सिखाता है. तो क्या, अगर तुम्हारी देवी सीता को अग्नि-परीक्षा देनी पड़ती है. तो क्या अगर तुम्हारी सीता को गर्भावस्था में जंगल छोड़ दिया जाता है. तो क्या अगर तुम्हारा कृष्ण नदी पर नहाती गोपियों के कपड़े चुराकर पेड़ पर छिपकर उनके नंगे बदन का मज़ा लेता है. तो क्या अगर तुम्हारी लक्ष्मी हमेशा विष्णु के चरणों में बैठी रहती है. तो क्या, अगर तुम्हारा ग्रंथ तुम्हारे मासिक-धर्म का रोना रो तुम्हे अपवित्र बता देता है. हम मर्द तुम्हें अक्सर ही रौंदते हैं. चाहे भगवान हो या इंसान, तुम हमेशा पिछलग्गू थे और रहोगे. तो क्या, अगर हरेक साल तुम तीन-चार लाख औरतों को हम तरह तरह से गाजर-मुली की तरह काटते रहते हैं. कभी बिस्तर पर, कभी सड़कों पर, कभी खेतों में. तुम्हारी भीड़ सत्संग के लिये ही जुटेगी पर हम मर्द के खिलाफ़ कभी नहीं जुट सकती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हे शोषित किया जाता है क्युंकि तुम उसी लायक हो. मर्दों की पिछलग्गू हो. भले ही हमें जनमाती हो, पर तुम बलात्कार के लायक ही हो. तुम्हारी तमीज़ तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन और हमारा हितैषी है. जब तक इस तमीज़ को अपने दुपट्टे में बांध कर रखोगे, तब तक तुम्हारे दुपट्टे हम नोचते रहेंगे. जब तक लाज को करेजे में बसा कर रखोगे तब तक तुम्हारी धज्जियां उड़ेंगी. मैं भूखा हूं, तुम भोजन हो. तुम्हे खाकर पेट नहीं भरता, प्यास और बढ़ जाती है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;The picture has been developed by &lt;a href="http://designerviru.blogspot.com/"&gt;Billo Da.&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-691860917459883783?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/691860917459883783/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='20 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/691860917459883783'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/691860917459883783'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='मैं मर्द हूं .... तुम  औरत..!!'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S9wr2AmIrTI/AAAAAAAAAIk/jRPmkLNINVw/s72-c/contact+men.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-4061162703767541069</id><published>2010-04-27T05:50:00.000-07:00</published><updated>2010-04-27T05:55:37.124-07:00</updated><title type='text'>तेरी संसद में अबकी आग लगाऊंगा…</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S9bewD1FWzI/AAAAAAAAAIc/iHDi2_OczWY/s1600/naxalites_india_revolution_maoism_cpi-maoist.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S9bewD1FWzI/AAAAAAAAAIc/iHDi2_OczWY/s200/naxalites_india_revolution_maoism_cpi-maoist.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5464800115103718194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे उधार मैं सूद समेत चुकाऊंगा,&lt;br /&gt;सूंघा सरकारी कुछ भी तो खून बहाऊंगा…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लूट-खसोट किया बहुत अब बारी मेरी,&lt;br /&gt;तेरी गोली से तेरा ही भेजा उड़ाऊंगा…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तु दिखा मुझे इक जंगल और जला के अब,&lt;br /&gt;तेरी संसद में अबकी आग लगाऊंगा…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रख बिजली अपनी और ये सड़कें अपने पास,&lt;br /&gt;दौड़ा-दौड़ा कर वरना इसपे ही मारूंगा…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रीन हंट तू करवायेगा किस-किस कोने,&lt;br /&gt;जहां पड़ा उन्नीस वहीं सुलाऊंगा…&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-4061162703767541069?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/4061162703767541069/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/04/blog-post_27.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/4061162703767541069'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/4061162703767541069'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/04/blog-post_27.html' title='तेरी संसद में अबकी आग लगाऊंगा…'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S9bewD1FWzI/AAAAAAAAAIc/iHDi2_OczWY/s72-c/naxalites_india_revolution_maoism_cpi-maoist.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-9131763504798449768</id><published>2010-04-05T10:23:00.000-07:00</published><updated>2010-04-05T10:27:05.654-07:00</updated><title type='text'>हरिद्वार की सैर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7odUlql3bI/AAAAAAAAAIE/V30yOS4HZV0/s1600/haridwar-tourism6.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 144px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7odUlql3bI/AAAAAAAAAIE/V30yOS4HZV0/s200/haridwar-tourism6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456706138058120626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हरिद्वार जाना पडा!! वर्ना ना तो अपनी दिलचस्पी हर की पौड़ी पर होने वाली महा-आरती में थी, ना ही ऊँचे पहाड़ो पर सोने में लिपटी मनसा देवी में. ना ही चंडी देवी से कोई राफ्ता रखता हूँ, ना ही ऋषिकेश में बने राम और लक्ष्मण झूले से. पर जाना बुरा था ऐसा नहीं कहूंगा. ऊंचे-ऊंचे पहाड़, लम्बे-लम्बे सागवान के पेड़, छोटी और घुमावदार सड़कें, शताब्दी एक्सप्रेस से ज़्यादा के स्पीड में दौडती जल-धाराएं, जंगलों और पहाडो के बीच से निकलती छुक-छुक गाडी. ऊंचाई पर गाडी पार्क कर नीचे बसे हरिद्वार को देखने का मज़ा वाकई शानदार था. बंदरों और लंगूरों की खिलवाड़, खच्चरों की जिद, सूरज की तपिश को चुनौती देती ठंडी हवाएं, और रह-रह कर चीखने वाला 'खोया-पाया' अनाउन्समेंट... सब कुछ मजेदार लगा.. यहाँ तक की जटाधारी साधुओं की हुडदंग भी. चोटीवाला रेस्तौरेंट से लेकर सड़क किनारे ढाबे भी ठीक-ठाक ही लगे. वैसे भी खाने के मामले में कोई ख़ास चोइस है नहीं अपनी सो जो मिल जाए डकार लेता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली से रात २ बजे निकला. मुनिरका से ऑटो किया. कमबख्त मीटर से चलने को तैयार तो हुआ लेकिन ऐसे रास्ते घुमा के ले गया की १५० रुपये किराया बन गया. जितना आई.एस.बी.टी से हरिद्वार का भी नहीं है. सुबह ९ बजे मैं हरिद्वार में था. १० बजे मेरे प्रिय जन भी आ गए जिनकी वजह से मुझे जाना पडा था. मां, बाबु जी, भैया, भाभी, कोमल और मयंक. पूरा परिवार. हरिद्वार स्टेशन से जब बाहर निकला तो वहां पंडों की लाईन लगी थी जो जात-पात पूछ रहे थे. मतलब साफ़ था ठगी का धंधा करने वाले उन सबका कुल-पुरोहित बनकर पैसे बनाने में लगे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाते ही सबसे पहले हर की पौड़ी गया. वहां सब ने अपने पाप धोने के लिये गंगा मे डुबकी लगायी. मुझे भी जबरन उस पानी में जाने के लिये मजबूर होना पड़ा. वैसे धूप तो सख्त थी लेकिन गंगा की धार तेज़ और उसका पनी उतन ही ठंडा. झूठा दिखावा करते हुए.. सबकी नज़रों से बच-बचाकर मैं कौआ-स्नान करके बाहर आया. एक बात तो थी. वहां का माहौल दर्शनीय था. उस मन्दिर में बसने वालों मे अपनी दिलचस्पी हो ना हो.. लेकिन उसके नाम में जो कला-कृतियां बन गयी वो क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी. एक तरफ़ शंकर की इतनी विशाल र ऊंची मूर्ति जितनी की खुद वहां की एक-दो पहाड़ें. छोटे बड़े कुल ७-८ एक रंग की मंदिरें. हरिद्वार की घाटें जो ऐसा लगता है बस स्नान के परपस सेही डिज़ाइन की गयी हों, वाक़ई अच्छी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुलिस का जत्था मानो तस्कीन कर रहा हो कि हम किसी को खतरे में नहीं पड़ने देंगे. सब के सब जवान, कम उमर वाले. दारोगा से लेकर सिपही तक. तैराकी दस्ता भी बिल्कुल मुस्तैद, मानो कह रह हो - लाख कोशिश कर लो, डूबने नहीं देंगे. पंडित रह-रह कर माइक पर चिल्ला रहा है - साबुन लगाकर गंगा में ना उतरें, घाट पर खाना ना खायें, गंदगी ना फैलायें... वगैरह-वगैरह!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां से अब हम निकल पड़े - मनसा देवी की ओर... चढाई ही चढाई.. खतम होने का नाम ही ना ले.. और वो भी सीढियां!! पहाड़ हो सीधा तो मज़ा भी आये.. एक बात मुझे समझ नहीं आती.. किस उल्लू के पट्ठे ने ये साज़िश की. सारे के सारे दुर्गा रूप ऊंची पहाड़ी पर जाकर बसे हैं. चाहे हरिद्वार की मनसा या चंडी देवी हो या जम्मू की वैष्णो देवी. रूकते-बैठते-उठते-कसरत करते हम मनसा देवी के पास पहुंचे. १ घंटे से ज़्यादा लग गया उस चढ़ाई में. पर रास्ते में लंगूर और बंदरों की चुहलबाज़ियों ने अच्छा मनोरंजन किया. मेरे मन में रोपवे पर चढ़ने की बात जो चल रही थी वो ख़तम हो गयी चुंकि वो तकनीकी खराबियों की वजह से बन्द था. कमो-बेश यही कहानी चंडी देवी के साथ हुई और वहां का रोप-वे भी बंद ही था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला दिन खतम हुआ पर दुर्भाग्य से हर की पौड़ी की महा-आरती छूट गयी सो सुबह-सुबह उठ कर जाना पड़ा. आरती यूं तो बेमानी थी लेकिन दृश्य अदभुत. लाखों या करोड़ों दीये गंगा में एक साथ प्रवाहित हो रहे थे. बड़े-बड़े थालों में आरतियां हो रही थी. चांद की परछाई गंगा में झिलमिला रही थी क्युंकि तब तक सूरज अपने रथ पर सवार नहीं हुआ था. इसके बाद हमने एक गाड़ी रिज़र्व की जो हमें ऋषिकेश घुमाने वाला था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शान्ति कुंज, नीलकंठ, राम और लक्ष्मण झूला मेरे दिमाग में तो शायद वो जगह नहीं बना पया जो हरिद्वार से वहां तक जाने में इस्तेमाल किये रास्ते ने बनाया. पहाड़ों और जंगलों के बीच. हाथियों का गुच्छा, उनके गले में लगी टुनटुनाती घंटी, और उनको हांकता महावत दिल्ली शहर में भूले-भटके ही दिखते हैं. उपर वाली सड़क से नीचे वाली सड़क दिखती थी, और नीचे वाली सड़क से उपर वाली. ऐसा लग रहा था मानो एक ही जगह के चक्कर लगा रहे हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरिद्वार की सैर कुछ मायनों मे मस्त रही तो कुछ मायनों में बेहद घटिया. करोड़ों आदमी का पागल की तरह भगवान का दर्शन करना जिसमें दुर्भाग्य से मेरे परिजन भी शामिल हैं, मुझे कचोटती रही. इसके साथ-साथ भारत जागृति मोर्चा का वो पोस्टर – “सर्व धर्म समान?” मुझे रास्ते भर हिलाता रहा. किताबें या पत्रिकाएं जो भी कहिये, बंट रही थी जिसमें से मेरे मां के हाथ भी एक लगी. और वो मुझे पढ़ा कर मानो हिन्दु धर्म की महत्ता को साबित करने का कोरा प्रयास करने में लगी थी. ये एक पत्रिका थी जो हिन्दु धर्म की महत्ता कम और बाक़ी धर्मों की ख़ामियां ज़्यादा गिना रही थी. मां को समझाने-बुझाने के बाद (जो कि मुश्किल है) दूसरे दिन, रात १२ बजे हरिद्वार से दिल्ली लौटने के लिये बस स्टैंड की तरफ़ निकला तो मेरा सामना सिर्फ़ उन्ही होर्डिंग से होता रहा – “सर्व धर्म समान?” और मेरे मुंह से हर बार गालियां निकलती रही – “सर्व धर्म – अधर्म.”&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-9131763504798449768?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/9131763504798449768/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/9131763504798449768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/9131763504798449768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='हरिद्वार की सैर'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7odUlql3bI/AAAAAAAAAIE/V30yOS4HZV0/s72-c/haridwar-tourism6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-7676005725562415432</id><published>2010-03-30T12:39:00.000-07:00</published><updated>2010-03-30T12:46:34.764-07:00</updated><title type='text'>बीयर की बोतल और बच्चों की मार-मार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7JVBNMizeI/AAAAAAAAAH0/u-C_BGQUChM/s1600/ragpicker.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7JVBNMizeI/AAAAAAAAAH0/u-C_BGQUChM/s200/ragpicker.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5454515577909595618" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कैपिटल कोर्ट, मुनिरका. ऑफ़िस से आने के बाद एक बिगड़े दोस्त को समझाना था. दो-चार फिलोसॉफी पिलानी थी. और यह तब तक मुमकिन नहीं था जब तक उसे बीयर ना पिलाऊं. ठेके से दो बीयर की बोतल ली. बगल के पनवाड़ी से एक डिब्बी सिगरेट ली. और वहीं बने दो-चार चबूतरॊं में से एक पर बैठ गया. बैठते ही बच्चों का हुजूम वहां आ पहुंचा. कुल दस-बारह बच्चे होंगे. सब के हाथ में एक-एक ओपनर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“भैया! ओपनर लो, पैसा नहीं लगेगा बस बीयर की खाली बोतल हमें दे देना…”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हम खुद ही खोल लेंगे, जाओ यहां से”, मैनें झिड़क दिया. मैं किसी को भी ऐसी हालात में कुछ देना पसंद नहीं करता. ’सहानुभूति’ और ’तरस’ जैसे शब्दों से मुझे बहुत नफ़रत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं अचानक मुझे क्या हुआ कि मैनें उस हुजुम में खड़ी एक बच्ची को बुलाया और उसे एक रुपये का सिक्का देकर उससे ओपनर लिया. मुझे बुरा लगा. एक रुपये से उसकी ज़िंदगी में कौन सा आमूलचूल परिवर्तन होने वाला था? अगर देना ही था तो कुछ और देता. एक बेहतर ज़िंदगी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैनें उन सारे बच्चों को यह कहकर भगाया कि पीने दो, बोतल तब लोगे ना जब ये खाली होगी. वो चले गये. हमने बीयर पीना शुरु किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी आधी बोतल बची ही थी कि एक बच्ची मेरे पास आके बैठ गयी और सिफ़ारिश करने लगी कि मैं ये ख़ाली बोतल उसे दे दूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर से एक बारह-तेरह साल का बच्चा आया और मुझे बोलने लगा कि ये बोतल उसे चाहिये. उसका लहज़ा सख्त था. लड़की ने कहा – “भैया ये बोतल बेच कर गुटखा खायेगा, इसे मत देना”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैनें पूछा – “तुम क्या करोगी इसे बेचकर?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे एक बोतल के तीन रुपये मिलेंगे, दो बोतल के छ: हो जायेंगे. मैं मम्मी को दे दूंगी तो कल की सब्जी हो जायेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो लड़का इस बच्ची के हाथ मरोड़ने लगा. उसे धमकाया भी. मैनें उसे डांट कर भगाने की कोशिश की. पर उसने उल्टे मुझे धमकी दी कि अगर मैनें उसे ये बोतल ना दी तो वो पुलिस को बतला देगा. वो उस बच्ची को मारने लगा. मुझे ताज्जुब हुआ. गुस्सा भी आया. मैं उसपे हाथ तो न उठा सका लेकिन उस बच्ची को उसके गिरफ़्त से निकालकर अपने पास बिठा लिया. लड़का टस से मस ना हुआ. बुदबुदाया – “थोड़ी सी बची है, अगर पूरी बोतल भरी होती न तो बताता.” मैं डरा तो नहीं पर उसके गट्स को देखकर उसके लिये आशंकित ज़रूर था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चा-जात में भी वही महिला शोषण! या फिर ग़रीबी की कुंठा! या सेल्स की भांति सेट किये हुए किसी टार्गेट को पूरी करने की भूख! कुछ तो ज़रूर था! उसकी कुंठा इसकी पुष्टि कर रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“मैं देखता हूं, मेरे सिवा कौन ये बोतल ले जाता है?”, एक अजीब सा तेवर था उसके पास. ये तेवर उसे आगे कहां ले जायेगा, क्या पता? पर उसका आज ख़तरे में था जिसे सुधार पाना मेरे लिये मुमकिन नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोतल मुंह में ही लगी थी. अभी खतम नहीं हुई थी कि वो लड़का और उसके साथ दो-चार और झपट पड़े. वो लड़की चुपचाप बैठी रही. उसकी सूखी और झुकी आंखे, उदास चेहरा, और निर्बल हाव-भाव मानो कह रहा हो कि अब उनका क्या चलेगा इन लड़कों के सामने.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब लड़ाई उस लड़के और लड़की के बीच से निकल चुकी थी और मर्दाना जंग बन चुकी थी. चार लड़के. क़रीब एक ही उमर के. चारो एक-दूसरे के उपर. मानों बोतल नहीं सोने की बिस्किट हो. शायद उनके लिये यही हो…! या फिर ये लड़ाई थी दंभ की, स्वाभिमान की, भूख की… या शायद एक झूठी जीत की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उनसे ज़ोर-ज़बरदस्ती बोतल छीन ली, उन्हे भगाया और उस बच्ची की तरफ़ बोतल बढ़ा दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो बोली – “भैया!! इसमें अभी बची है, पी लो तब दे देना.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में ही वो बच्ची मातृत्व का भाव लिये, और वो बच्चा भेड़िये की शक्ल मे दिखा. सड़कों पर क़िस्मत टटोलता, हाथ फैलाता, गुटखा चबाता, बीड़ी पीता ये तीन फ़ीट का फ़्रेम भी उसी मानसिकता का है जिसे हमारा समाज ढो रहा है. क्या कोई भगवान है जो इस भटकते बचपन को एक नई राह दे सके. यक़ीनन नहीं! ये दोष किसके उपर मढूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन ग्लानि से भरा रहा कि काश! मैं इनके लिये कुछ कर पाता!! और फिर बेशर्मों की तरह वहां से वापस अपनी झोपड़ी की ओर चल पड़ा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-7676005725562415432?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/7676005725562415432/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post_7432.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/7676005725562415432'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/7676005725562415432'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post_7432.html' title='बीयर की बोतल और बच्चों की मार-मार'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7JVBNMizeI/AAAAAAAAAH0/u-C_BGQUChM/s72-c/ragpicker.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-1854467562478975843</id><published>2010-03-30T02:40:00.000-07:00</published><updated>2010-03-30T02:46:26.647-07:00</updated><title type='text'>चुप हो जाओ नहीं तो चलती ट्रेन से फेंक दूंगा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7HIHZZdLNI/AAAAAAAAAHs/WNqtoLF1yAs/s1600/viks.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7HIHZZdLNI/AAAAAAAAAHs/WNqtoLF1yAs/s200/viks.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5454360653124676818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार - विकास कुमर www.qalamse.blogspot.com&lt;br /&gt;धर्म हमारे यहां एक बेहद संवेदनशील विषय हैं.  धर्म या भगवान के बारे में कुछ भी बोलने से लाखों लोगों की भावनाएं ऐसे भड़कती हैं जैसे अपनी परछाईं को देखकर भेड़ या लाल कपड़े को देखकर सांड़ भड़कता है. मुझे तो लगता है कि इन्सान इस विषय पर ऐसा भड़कता है कि कुछ देर के लिए मरखंड से मरखंड़ साड़ भी शरमा जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों हम अपने धर्म के बारे में आलोचना का एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते. क्यों हम राम को न मानने वालों को चलती ट्रेन से फेंक देने की धमकी दे देते हैं? क्यों हम इस बारे में कोई तर्क नहीं करना चाहते और तर्कपूर्ण बातों को भी अपनी थोंथी दलीलों से पोत देना चाहते हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी समझ से ऐसा इसलिए होता होगा क्योंकि हम नहीं चाह्ते कि कोई हमारी सोच पर प्रहार करे बल्कि यह चाहते हैं कि हम चीजों को जैसे देख रहे हैं, समझ रहे हैं दूसरे भी वैसा ही समझें और देखें. उसी राह पर चलें जिस राह पर हम चल रहे हैं. वैसे तो भगत सिंह को इस देश में बहुत इज्जत दी जाती है लेकिन धर्म और भगवान के बारे में कही गई उनकी बातों को लोग सिरे से नकार देते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा ऐसे कुछ कट्टर हिन्दूओं से पाला पर चुका है. आगे कुछ भी कहने से पहले मैं यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जिन लोगों से मैं उस ट्रेन में मिला वो विश्व हिन्दू परिषद या बजरंग दल के कार्यकर्ता नहीं थे बल्कि हमारे आपके जैसे आम लोग थे. जो एक आम ज़िन्दगी जीते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात ज्यादा पुरानी नहीं है. मैं अपने भाई को बंग्लौर पहूंचा कर ट्रेन से पटना लौट रहा था. संघमित्रा एक्सप्रेस में मेरे साथ जो और सहयात्री थे उनमे से ज्यादातर बिहार या उत्तर प्रदेश के थे. वो लोग भी अपने-अपने बेटे-बेटियों को पहुंचा कर लौट रहे थे. ट्रेन में बैठने के थोड़ी देर बाद ही हम सब की जान पहचान हो गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शम  6:30 की  गाड़ी थी सो पहली रात में हल्की-फुल्की बातचीत हुई और फिर हम सब अपने अपने बर्थ पर सो गए.  दूसरे दिन जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी हमारी बातचीत भी परवान चढ़ रही थी.  दिनभर वही सब बातें होती रहीं जो अक्सर ट्रेन और बसों में यात्रा के दौरान होती हैं. जिन्हें आप रास्ता कटाउ बातें भी कह सकते हैं लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलने लगा वैसे-वैसे ही बातचीत का माहौल भी बदलने लगा. &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;हम लोगों के साथ एक मुस्लिम लड़का भी सफर कर रहा था. वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं जान पड़ता था. बात कहीं से घूमते फिरते धर्म और खासकर इस्लाम धर्म के बारे में होने लगी थी. करीब करीब चार लोग आरोप लगा रहे थे और अकेले वह लड़का अपनी पूरी क्षमता से अपने धर्म का बचाव कर रहा था. इस सब में एक मोटे ताजे पंडित जी भी थे जो उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो कुछ ज्यादा ही आरोप लगा रहे थे. जैसे इस धर्म में तो बच्चे को पैदा होते ही मारकाट सिखाया जाता है. वो अपनी बात को साबित करने के लिए हर फालतू से फालतू तर्क का सहारा ले रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे अपनी उपर कही बात को साबित करने के लिए उन्होंन तर्क दिया कि मुस्लमानों में लड़कों का खतना होता है और खतना इसलिए होता है कि  वो खून देख सके और आगे के लिए तैयार हो सके. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब के बीच मैं चुप था और सोच रहा था कि जल्दी से जल्दी यह विषय बंद हो लेकिन वो तो बोलते ही जा रहे थे. उन्हें पता था कि  मैं पेशे से पत्रकार हूं सो उन्होने इस बारे में राय मागीं. लेकिन मैंने कुछ भी कहने से मना कर दिया. अब उनके साथ-साथ पटना के भी कुछ लोगों ने मुझसे बोलने के लिए कहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बोलना तो चाहता ही था लेकिन माहौल को देखकर चुप था. मैंने उन सभी से कहा कि मैं इस विषय में इसलिए कुछ नहीं बोलना चाहता क्योंकि मैं किसी भी धर्म और किसी भी भगवान नामक सत्ता पर विश्वास नहीं करता. पर बोलना पड़ा. उत्तर प्रदेश वाले पंडित जी ने मुझ पर सवालों की झरी लगा दी. जैसे मेरे पापा का क्या धर्म है? अगर भगवान नहीं है तो यह दुनिया कैसे चलती है? अगर कोई शक्ति नहीं है तो मैं कहां से पैदा हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वही कुछ सवाल थे जो हर एक आस्तिक, एक नास्तिक के सामने रखता है. मैंने भी पूरी कोशिश की जबाव देने की और उन्हें संतुष्ट करने की लेकिन वो नहीं माने. मैंने अपनी बात को भगत सिंह और राहुल संस्कृतायन के सहारे भी कहने की कोशिश की लेकिन कोई फयदा होता नहीं दिखा. हालात इस तरह के हो गए थे कि उस पूरे ड्ब्बे में केवल दो लोग बोल रहे थे. एक पंडित जी और एक मैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग बीच-बीच में पंडित जी के साथ हो जाते थे. मैं बिलकुल अकेला पड़ रहा था. सो सोचा कि बात ही बंद कर दूं. लेकिन वो मुझे ऐसा भी नहीं करने दे रहे थे. उनकी बे तर्क की बातें सुन-सुन कर मुझे गुस्सा आ रहा था लेकिन मैं संयम से उनकी हर बात का जवाब देने की कोशिश कर रहा था. उनका चेहरा लाल हो गया था. वो बोलते-बोलते मेरे बिलकुल पास वाली सीट पर आ गए थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि इतने सारे लोग जो धर्म और भगवान को मानते हैं क्या वो सारे बेवकूफ हैं? मैंने कहा, ऐसा नहीं है लेकिन वो सारे लोग मुझे अंधे लगते हैं जिन्हें केवल अपना धर्म और अपना भगवान दिखता है. क्या है भगवान का अस्तिव? किसने देखा है भगवान को&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;ये अंधापन नहीं है तो और क्या है कि एक पथर की मुर्त्ती जो बिना आपकी मदद से हिल भी नहीं सकता उसमे आपको अपना भगवान दिखता है. आप उस राम को जपते हैं और मर्यादा पुरुष कहते हैं जो अपनी गर्भवती पत्नी को अकेले जंगल में छोड़ देता है. मैंने कहा, अगर आपके राम आज होते तो उनकी पत्नी ने तलाक ले लिया होता और वो जेल में सजा काट रहे होते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे इतना कहते ही उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहूंच गया और उन्होंने मुझे चेतावनी देते हुए कहा, “अगर तुमने आगे एक शब्द और बोला तो यहीं ट्रेन से फेंक दूंगा.” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके इस बोल के साथ ही वो बातचीत खत्म हो गई. वो अपने बर्थ पर चले गए और सारे लोग मुझे सांत्वना देने लगे और मैं उस वक्त बिल्कुल शांत था. आसपास खड़े किसी ने भी उनको यह नहीं कहा कि आपने गलत बोला. इसके उलट कुछ लोग मुझे ही समझा रहे थे कि ऐसे नहीं बोलना चाहिए था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद सही कह रहे थे वो लोग कि मुझे अपने विचार नहीं रखने चाहिए थे. चुप रहना चाहिए था क्योंकि यहां वैसे लोग नहीं चाहिए जो धर्म के पाखंड में नहीं पड़ना चाहते हैं और इस बारे में खुल कर बोलना चाहते हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-1854467562478975843?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/1854467562478975843/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post_30.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1854467562478975843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1854467562478975843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post_30.html' title='चुप हो जाओ नहीं तो चलती ट्रेन से फेंक दूंगा'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S7HIHZZdLNI/AAAAAAAAAHs/WNqtoLF1yAs/s72-c/viks.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-599224013226086243</id><published>2010-03-26T15:19:00.000-07:00</published><updated>2010-03-26T15:46:53.425-07:00</updated><title type='text'>जहन्नुम की जय हो!!</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S6030_C6fkI/AAAAAAAAAHc/kFIindKIEzQ/s1600/luara.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 362px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S6030_C6fkI/AAAAAAAAAHc/kFIindKIEzQ/s400/luara.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5453076107231919682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बहुत लोगों ने डराया. समझाया. बतलाया . सलाह दिये. भगवान के घर देर है अंधेर नहीं. अभी भी पूजा-पाठ शुरु कर दो. वो बहुत दयालू है. मुआफ़ कर देगा. सुबह दो अगरबत्ती उनके नाम से जला दिया करो. मैनें सोचा – अगरबत्ती तो अभी भी जलाता हूं. वो बात और है कि मेरे घर इस बत्ती की भूमिका शौचालय को सुगंधित करने की होती है. शुभचिंतको ने बात आगे बढायी - अभी जिद करते हो. जब उमर बढेगी और अकल आयेगी तब रोना-धोना करोगे. तब पछताने से बढिया है कि अब पूजा-पाठ शुरु कर दो. हिन्दु हो. थोड़ा तो मान रखो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोगों ने कहा, अरे अल्लाह-इश्वर सभी तो एक ही हैं. बस उनको याद करो. पूजा-पाठ ना भी करो पर उनकी इज्ज़त तो करो. जहन्नुम से बचोगे. स्वर्ग की प्राप्ति होगी. सुधर जाओ. इन सजेशन बांटने वालों में से एक मेरी मां भी थी. बिचारी बहुत डरती है कि कल को उसका भगवान मेरे साथ क्या सलूक करेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी सोचने लगा. और सोचा. बहुत देर तलक सोचा. झिझका, हिचका, और फिर निष्कर्ष पर पहुंच गया. बोला – जहन्नुम की जय हो. वैसे जन्नत में जाकर भी क्या जहां पसन्द के लोग मिले ही नहीं. अगर भगवान को गरियाने से या उसे ना मानने से नरक ही मिलनी है. तब तो नरक मे मेरे चहेते लोग बैठे होंगे.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सादत हसन मंटो, भगत सिंह, लेनिन, फ़्रेड्रिक नीशे, अल्बर्ट कामो, सलमान रुश्दी, राहुल सांस्कृत्यायन, हुसैन साहब, तसलीमा नसरीन, कमलेश्वर, मिर्ज़ा ग़ालिब… और ना जाने कौन-कौन!! सब तो जहन्नम में ही मिलेंगे. और तो और मेरे ढेर सारे दोस्त भी वहां मिलेंगे. मेरे प्रिय खुशवंत जी को भी क़ायदे से वहीं होना चाहिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्नत में जाकर ही क्या होगा – वहां मोदी का भाषण और मौलवियों का फ़तवा सुनके पक जाऊंगा. ठाकरे पता नहीं जन्नत का क्या हश्र करेगा. वहां भी कहीं मराठा प्रांत ना बना ले. और तो और वहां मेरा सबसे बड़ा दुश्मन ए. सूर्यप्रकाश भी होगा जो हुसैन साहब की पेंटिंग के पीछे पगले हिंदुओं को भड़काने में लगा हुआ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर घंटा से फिकर…. भाड़ में जाये राम-नाम… और झक मारे जन्नत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपन को जह्न्नम ही चाहिये… “जह्न्नम की जय हो”&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-599224013226086243?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/599224013226086243/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html#comment-form' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/599224013226086243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/599224013226086243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html' title='जहन्नुम की जय हो!!'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S6030_C6fkI/AAAAAAAAAHc/kFIindKIEzQ/s72-c/luara.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-1571537604785638948</id><published>2010-03-11T08:54:00.000-08:00</published><updated>2010-03-11T08:56:37.244-08:00</updated><title type='text'>धर्म के ना रंग होते, अधर्म फिर होता नहीं…</title><content type='html'>जीत के आगे छुपा,&lt;br /&gt;है लोभ का कोहरा घना…&lt;br /&gt;हार कर देखा है मैंनें,&lt;br /&gt;शर्म से जो मुंह बना..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिणाम गर होते नहीं तो,&lt;br /&gt;कितना सुन्दर दृश्य होता..&lt;br /&gt;फिर विफल होता ना कोई,&lt;br /&gt;और ना कोई दिव्य होता…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न कर्ण ही तब छला जाता,&lt;br /&gt;और न लंका जला जाता…&lt;br /&gt;दूर उस एक गांव में फिर,&lt;br /&gt;नक्सली ना पला जाता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म के ना रंग होते,&lt;br /&gt;अधर्म फिर होता नहीं…&lt;br /&gt;बेफ़िक्र हो सोते सभी,&lt;br /&gt;बच्चा कोई रोता नहीं…&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-1571537604785638948?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/1571537604785638948/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post_11.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1571537604785638948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1571537604785638948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post_11.html' title='धर्म के ना रंग होते, अधर्म फिर होता नहीं…'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-3969055939045476619</id><published>2010-03-03T21:45:00.000-08:00</published><updated>2010-03-03T21:47:09.993-08:00</updated><title type='text'>मैं तुम्हे आदाब भी नहीं कहूंगा क्योंकि इतनी अदब नहीं है मुझमें</title><content type='html'>लोगों के चहेते चेहरों और नक़ाब-पोशों,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तुम्हे आदाब भी नहीं कहूंगा क्योंकि इतनी अदब नहीं है मुझमें…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग कहते हैं कि तुम बहुत ताक़तवर हो, तुमने जहां बनाया, आसमान बनाया, पेड़-पौधे बनाये, जीव-जन्तु बनाये, चांद-सितारे बनाये, इंसान बनाया!! कुल मिलाकर सब कुछ तुम्ही ने बनाया है. तुम चाहो तो किसी को भिखारी बना सकते हो, चाहो तो किसी को राजा बना सकते हो. तुम ना चाहो तो हवायें चलनी बंद हो जाये, सूरज निकलना बंद हो जाये, प्रलय आ जाये और ना जाने क्या-क्या…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर तुम हो भी, और तुममे ऐसी ताक़त है तो मैं तुम्हे चैलेंज करता हूं. मैं हर मिनट तुम्हे गरियाऊंगा. जो उखाड़ना होगा-उखाड़ लेना. तुम से मेरा मतलब तुम सभी से है. चाहे वो कपटी राम का हुलिया हो, या जल्लाद अल्लाह का. चाहे वो चमचे इन्द्र की सूरत हो या पैग़म्बर मोहम्मद की. चाहे वो नपुंसक जीसस की बात हो या कमीने कृष्ण की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं गरियाऊंगा, गरियाता हू, और गरियाता रहूंगा!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक, जब तक या तो तुम लोगों के दिमाग से नहीं भाग जाते, या मैं मर नहीं जाता.&lt;br /&gt;भाग जाओ!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-3969055939045476619?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/3969055939045476619/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/3969055939045476619'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/3969055939045476619'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='मैं तुम्हे आदाब भी नहीं कहूंगा क्योंकि इतनी अदब नहीं है मुझमें'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-8126413618868207866</id><published>2010-01-25T08:28:00.000-08:00</published><updated>2010-01-25T08:30:03.500-08:00</updated><title type='text'>किसके लिए?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S13G92akFEI/AAAAAAAAAEM/dT3g1-g87IQ/s1600-h/tiranga.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S13G92akFEI/AAAAAAAAAEM/dT3g1-g87IQ/s400/tiranga.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5430715491559937090" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कॉपी, कट, और पेस्ट वाले संविधान को अबकी साठ साल पूरे हो गए. ताई जी सुबह सुबह तिरंगा लहरायेंगी और ताऊ शाम होते ही उसे उतार लेंगे. इन साठ सालों में 25 झंडे चढ़ते-उतरते तो जरूर देखा है आज के दिन. हरेक साल बस यही सोचता रहा की ये जश्न किसके लिए? ये शक्ति प्रदर्शन किसके लिए? ये धमा-धम फायरिंग किसके लिए? तोपों की सलामी किसके लिए? रोकेट की कला-बाजियां किसके लिए? झांकिया हर राज्य की किसके लिए? भव्य परेड किसके लिए? 10  दिन पहले से इंडिया गेट की रूट का ट्राफिक जाम किसके लिए? कबूतरों को उड़ाया जाना किसके लिए? कैदियों को रिहा करने की कवायद किसके लिए? दिखाने के लिए या देखने के लिए?&lt;br /&gt;इतना सब कुछ सोचने के बाद हर साल मै एक ही सवाल पर ठहरता हूँ, "जिस देश में अभी भी लाखों लोगों की आमदनी 20रुपये प्रतिदिन है, उस देश में में अरबों का खर्चा एक दिन में... किसके लिए?"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-8126413618868207866?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/8126413618868207866/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/8126413618868207866'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/8126413618868207866'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='किसके लिए?'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/S13G92akFEI/AAAAAAAAAEM/dT3g1-g87IQ/s72-c/tiranga.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-4511852677744947103</id><published>2009-11-19T13:32:00.000-08:00</published><updated>2009-11-19T13:41:56.400-08:00</updated><title type='text'>सूरज को साहिल तेरे आगे ही ढ़लना होगा…</title><content type='html'>हर मुश्किल से तुमको निकलना होगा,&lt;br /&gt;ख़ुद ही, अपना ख़ुदा बनना होगा…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिलचिलाती धूप और कँपकँपाती सर्द,&lt;br /&gt;बेहद क़रीब से इनके गुज़रना होगा…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक़्त दिखायेगा कभी, कुछ ग़लत राहें,&lt;br /&gt;आँखों को हरदम ही खुला रखना होगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डँस लेगा, आस्तीन में छुपा साँप कभी,&lt;br /&gt;उनपे भी तुमको, हौले से हँसना होगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुझे परवाह करने की ज़ुरुरत ही क्या है,&lt;br /&gt;सूरज को 'साहिल' तेरे आगे ही ढ़लना होगा…&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-4511852677744947103?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/4511852677744947103/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/11/blog-post_19.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/4511852677744947103'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/4511852677744947103'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/11/blog-post_19.html' title='सूरज को साहिल तेरे आगे ही ढ़लना होगा…'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-1760283542354453729</id><published>2009-10-30T01:00:00.000-07:00</published><updated>2009-10-30T01:13:58.989-07:00</updated><title type='text'>मै अजीबो-गरीब तरीके से मरना चाहता हूँ</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इतवार की सुबह वाकई ख़ास रही जब चाय की चुस्कियां और &lt;a href="http://www.bhadas4media.com"&gt;यशवंत भाई&lt;/a&gt; के वसीयतनामे पर चर्चा चल रही थी. बहुत दिन से बेरोजगार घूम रहा था.. सोचने के लिए कई दिन पहले एक मुद्दा सूझा था.."क्या है ऊपर वाले की लैंग्वेज".. तब से आज तक माथा-पच्ची करने की ज़ुरूरत नहीं हुई. तो अब शुरू करता हूँ सोचना मैं भी अपनी मौत के बारे...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने देखा है बुढापे में लोगों को खांसते, मैं तो आज भी खांसता हूँ.. लाज़मी है.. सुट्टे जो उडाता हूँ.. सोचता हूँ आज ऐसी हालत है तो बुढापे में क्या होगा. इसलिए मैं ४०-५० के दरमियान ही उठ जाऊं तो अच्छा रहेगा. ऐसा इसलिए भी है की मुझे हर वक़्त किसी का सहारा लेना पड़े, बात-बात पर डॉक्टर का आना-जाना हो, मेरे बच्चे काम की बजाये मुझमे व्यस्त रहें.. वो और उनकी बीवीयाँ मन ही मन कहें, "बुड्ढा उठता क्यूँ नहीं", इससे बेहतर जल्दी पार पा लेना ही है. अगर वो मेरी इज्ज़त भी करते हों फिर भी यही कहेंगे, "पापा को जल्दी मुक्ति मिल जाए तो अच्छा रहेगा, वो बहुत कष्ट में हैं."  और कष्ट तो मुझे होना ही है चूँकि मै सिगरेट छोड़ नहीं सकता..&lt;br /&gt;इतना तो तय हो गया कि ४०-५० में उठ जाऊं, अब सवाल है कैसे उठना पसंद करूंगा. स्वाभाविक मौत मुझे अजीब लगती है.. मरने वाला बिस्तर पे अपनी अंतिम साँसे गिन रहा हो... और एकदम से ख़तम.. कुछ मौत से डरते हुए, कुछ मौत को करीब से देखते हुए.&lt;br /&gt;मुझे आप बुजदिल समझे या बेवकूफ.. मगर हकीकत तो यही है कि मै अजीबो-गरीब तरीके से मरना चाहता हूँ जिसमे मेरे प्राण भी निकल जाए और मेरी एक इच्छा (अंतिम इच्छा नहीं कहूँगा, यह पहले भी पूरी हो सकती है.) भी पूरी हो जाए.. मैंने आज तक किसी बड़े एक्सीडेंट को करीब से नहीं देखा है.. तो मेरी चाहत यही है कि किसी बड़ी दुर्घटना में मेरी मौत हो.. जैसे २६/११, ९/११ या ऐसी ही कोई बड़ी घटना.. कोई दंगा, सुनामी, भूकंप, वगैरह-वगैरह.. इस बहाने मेरी मौत की तारीख कोई भूल नहीं पायेगा.&lt;br /&gt;मरने के बाद मेरी लाश का क्या हो? जलाया जाए, दफनाया जाए, बहाया जाए, या यूँ ही बालू-घर में सड़ाया जाए.. सोचेंगे, इसपर भी सोचेंगे. पहले कुछ और भी ज़रूरी बातें रह गयी हैं.. वैसे तो मेरी आँखे -५ पावर के चश्मे से ही चल पाती है, मगर क्या पता इन आँखों से भी कोई ये दुनिया देख ले, इससे मुझे बड़ा पुण्य मिलेगा.. (क्यूंकि अब तक ये आँखे खूबसूरती निहारने के काम ही आयी है). वैसे सच कहूं तो मुझे दूसरों के शरीर के साथ चीड-फाड़ पसंद नहीं है.. मगर मै तो देखने को जिंदा रहूँगा नहीं सो मेरे शरीर की साथ ये किया जाए और मेरी आँखों का इस्तेमाल हो, ऐसी मेरी कामना है. बाक़ी हिस्सों के साथ छेड़-छाड़ ना की जाए.&lt;br /&gt;मै एक कट्टर नास्तिक हूँ. सख्त मजहब विरोधी. "अल्लाह - इश्वर - गॉड" के अस्तित्व को ललकारने और नकारने मे भरोसा रखता हूँ. तो इसलिए किसी रीति-रिवाज़ के मुताबिक मेरा किरया-करम हो, ऐसा मै चाहता नहीं. तो फिर मेरे मुर्दे शरीर का क्या हो.. मेरे हितैषी इसके साथ क्या करेंगे, मुझे पता नहीं.. मगर मेरी इच्छा यही है की मेरे लिए एक छोटा सा घर बनाया जाए मेरे गाँव में. जिसमे बड़ी खिड़कियाँ, बड़े दरवाज़े हों. एक कमरे का घर, तीन तरफ खिड़कियाँ और एक दरवाजा.. छत उसका पिरामिड की शेप में हो.. उस घर के ठीक बीचों-बीच एक छोटा सा चबूतरा टाइप बने, जिसपे उम्दा क्वालिटी के मार्बल्स लगे हो. उसके नीचे मेरे मुर्दे शरीर को जगह दी जाए. कोई भी मंत्र ना पढा जाए इससे मेरे मृत शरीर को दुःख होगा.. हाँ, धुप, बत्ती जलाने पर पाबंदी ना रहे.. इससे वहाँ का वातावरण सही रहेगा.&lt;br /&gt;इस समारोह में वो सारे लोग आमंत्रित रहें जिनसे मेरा कटु या मधुर सम्बन्ध रहा है.. मगर कुछ लोगों को मै चाहूंगा कि ना आयें..&lt;br /&gt;अ) किसी भी पंडित को ना बुलाया जाए.&lt;br /&gt;ब) इंडिया टीवी का कोई रिपोर्टर ना आये. (इन्केस मै कोई नामी-गिरामी पर्सनालिटी बन गया)&lt;br /&gt;स) औपचारिकता निभाने वाले लोग बिलकुल वर्जित हैं.&lt;br /&gt;द) रोने-धोने वाली ग्रामीण महिलाएं ना आये. (वो चिल्लाती ज्यादा, और आंसू कम बहाती हैं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी ये तमाम इच्छाएं जो भी पूरी कर देगा, वो मेरी तमाम संपत्ति का वारिस होगा. हलाँकि ये एक रिस्क है क्यूंकि जमा पूँजी के नाम पर वर्तमान अन्धकार में है, हाँ कर्ज ज़रूर है.. क्या पता तब तक सही हो जाए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कौन होगा मेरे संपत्ति का अगला वारिस????&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-1760283542354453729?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/1760283542354453729/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/10/blog-post_30.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1760283542354453729'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1760283542354453729'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/10/blog-post_30.html' title='मै अजीबो-गरीब तरीके से मरना चाहता हूँ'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-7469490282527802326</id><published>2009-10-17T01:28:00.000-07:00</published><updated>2009-10-17T01:38:26.973-07:00</updated><title type='text'>नफ़रत कहाँ-कहाँ से मिटायें!!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://thesituationist.files.wordpress.com/2007/11/hate-image2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 800px; height: 545px;" src="http://thesituationist.files.wordpress.com/2007/11/hate-image2.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नफ़रत कहाँ-कहाँ से मिटायें!! एक घर की कहानी है. वहाँ एक लड़के का जन्म हुआ. खुशी की बात थी. पहला बच्चा था. वैसे बेटी भी होती तो भी खुशियाँ ही मनायी जाती. घर एक पढ़े-लिखे और सभ्य आदमी का माना जाता था. बच्चे का नाम क्या रखा जाये, सोचा जा रहा था. मुझसे भी एक नाम सुझाने को कहा गया. मैने सोचा क्युं ना इसी बच्चे के बहाने थोड़ी सी ही सही, दूरियाँ पाटने की कोशिश की जाये. मैने फ़ोन करके नाम बतलाया – साहिल. ये नाम मुझे अच्छा लगाता है. अथाह सागर का किनारा. समंदर का दायरा साहिल तक ही तो होता है.&lt;br /&gt;इस फ़ोन-वार्ता के क़रीब एक महीने बाद इनलोगों से मेरा मिलना मुमकिन हुआ. मैनें पूछा, भाई क्या नाम रखा बच्चे का. उनने बताया, बच्चे का नाम उसके दादा जी ने रखा है, मयंक सावर्ण. सुन के अच्छा लगा. “वैसे साहिल नाम भी बुरा नहीं था”, मैनें कहा. “पाग़ल हो गये हैं क्या! ये तो मुस्लिमों वाला नाम है. हम हिन्दु हैं”, आठ साल की एक बच्ची बीच में बोल पड़ी.&lt;br /&gt;ये जवाब किसी बड़े ने दिया होता तो मुझे कोई हैरानी नहीं होती. लेकिन उस बच्ची के इस जवाब ने नाजाने कितने सवाल खड़े कर दिये मेरे मन में!!!&lt;br /&gt;वो घर किसी और का नहीं मेरा ही था. वो नवजात शिशु मेरे बड़े भाई-साहब की पहली संतान थी. और वो बच्ची मेरे सबसे बड़े भाई की इकलौती और दुलारी बेटी थी.&lt;br /&gt;जिस घर में बेटे-बेटी को लेकर कोई भेद-भाव नहीं, वहाँ मजहब को लेकर कितनी ऊँची दीवार बनी है. अब आप ही बताइये, कहाँ कहाँ से मिटाऊँ नफ़रत!!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-7469490282527802326?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/7469490282527802326/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/10/blog-post_17.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/7469490282527802326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/7469490282527802326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/10/blog-post_17.html' title='नफ़रत कहाँ-कहाँ से मिटायें!!'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-8419866252757080693</id><published>2009-10-15T14:16:00.000-07:00</published><updated>2009-10-15T14:23:27.013-07:00</updated><title type='text'>आओ!! दरिद्दर भगायें...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://img.xcitefun.net/users/2008/10/13825,xcitefun-divali.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 500px; height: 375px;" src="http://img.xcitefun.net/users/2008/10/13825,xcitefun-divali.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“हुक्का पाती लोय-लाय,&lt;br /&gt;लक्ष्मी घर, दरिद्दर बाहर”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं दिल्ली में ऐसी कोई रस्म निभायी जाती है कि नहीं. मेरे गाँव में तो हमेशा से ही दिवाली में संठी जलाकर दरिद्दर को बाहर भगाया जाता है. माना जाता है कि लक्ष्मी घर तभी आयेगी जब दरिद्दर बाहर जायेगा. इसकी विद्वानों ने क्या विवेचना की है, क्या पता!! पर सच तो यही है कि किसी ना किसी विधि से इन्हे बाहर भगाने का तरीका ढूंढ ही लिया जाता है. चाहे लक्ष्मी के नाम पर, या कॉमन वेल्थ गेम के नाम पर.&lt;br /&gt;और वैसे भी जिसका भगवान ना हुआ, उसकी दिल्ली कहाँ होगी!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-8419866252757080693?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/8419866252757080693/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/10/blog-post_15.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/8419866252757080693'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/8419866252757080693'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/10/blog-post_15.html' title='आओ!! दरिद्दर भगायें...'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-1705668827196408107</id><published>2009-10-09T23:09:00.000-07:00</published><updated>2009-10-10T01:32:45.630-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दारू की खुमारी'/><title type='text'>दारू की खुमारी और देवता की याद</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सबसे पहले माफ़ी एक लम्बे विराम के लिए..&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/StApqEDYU6I/AAAAAAAAADM/ATzh5O3jeWI/s1600-h/20.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 143px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/StApqEDYU6I/AAAAAAAAADM/ATzh5O3jeWI/s320/20.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5390854556581647266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दोस्त के यहाँ दारू की दावत थी. पांच लोग थे हम. पीने का कारबार शुरू हुआ. थोडी बहुत झुनकी सवार होने लगी थी. एक ने गुनगुनाना शुरू किया, "गुलाबी आँखे, जो मैंने देखी...". मैंने बीच में टांग अड़ाई. भाई! आँखे झील सी हो सकती है. गुस्से से लाल हो सकती है. आसमान सी नीली हो सकती है. बिल्ली के माफिक भूरी हो सकती है. लेकिन गुलाबी तो किसी सूरत में नहीं हो सकती. ये विशेषण तो आँखों के लिए दिया ही नहीं जा सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक साहब आवेश में आ गए. कहने लगे, आर.ड़ी.वर्मन क्या बेवकूफ थे जो उनने इस गाने में म्यूजिक दिया? दारू की खुमारी तो थी ही. मेरा नेचर भी ऐसा है कि जो कह दिया सो कह दिया. मैंने बात आगे बढ़ाई. वर्मन हो या अख्तर हो, जो गलत है सो गलत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दलीलों का सिलसिला शुरू हुआ. किसी ने कहा, आँखों को ढकने वाली चमड़ी गुलाबी ही तो होती है. मैंने कहा वो पलक है, आँखे नहीं. किसी ने कहा आँखों में झाँक के देखिये, कुछ गुलाबी-गुलाबी सा तैरता है उनके बीच. मैंने कहा भाई आँखों के रंग से मतलब होता है कि आपके डिम्बे का क्या रंग है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक भाई साहब कूद पड़े. गुस्से से लाल हुए जान पड़ते थे. बोले, "आप क्या बर्मन साहब से ज़्यादा विद्वान् समझते हैं खुद को. आपमें हिम्मत है तो भगवान् राम को ऐसे गलत ठहरा के देखिये." मैं कुछ बोलता इससे पहले ही वो बोले, "आप हिन्दू होने के नाते उनके बारे में कुछ नहीं बोल सकते, इसी हिसाब से बर्मन साहब म्यूजिक के भगवान् हैं, और आपको उनके बारे में बोलने का भी कोई अधिकार नहीं है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/StAqT7WrtCI/AAAAAAAAADc/TC7ycD7iQbA/s1600-h/rama.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 198px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/StAqT7WrtCI/AAAAAAAAADc/TC7ycD7iQbA/s320/rama.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5390855275801195554" /&gt;&lt;/a&gt;मैंने पूछा, आपकी बात ख़तम हो गयी? जवाब आया, हाँ. मैंने कहा, भाई राम का तो हिसाब-किताब ऐसा है कि सामने हो तो साले का सर फोड़ दूं. ले तेरी! मेरा ऐसा बोलना था कि बवाल शुरू हो गया. मैंने सफाई दी. रुक जाईए. शांत हो जाईए. मेरी बात सुन लीजिये. फिर जो मन में आये कीजिये. मुझे भगा दीजिये या खुद भाग जाईए. गनीमत थी कि वो सुनने को तैयार हो गए. मैंने सीता के गर्भवती होने के बाद, उनके वनवास का प्रसंग उठाया. उन्होंने तर्क दिया, राम तो मर्यादा पुरोषत्तम थे. उन्होंने अपनी प्रजा के लिए ऐसा किया. ऐसा करके उन्होंने साबित किया कि उनके साम्राज्य में धोबी की बात को भी महत्व दिया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तर्क काटते हुए मै बोल पडा, साला! ऐसा भी क्या मर्यादा पुरोषत्तम होना कि एक धोबी की ग़लतफ़हमी दूर करने के बजाय उसके शक को सही साबित किया जाए. और एवज़ में गर्भवती औरत को जंगल का रास्ता दिखाए.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सहमती में एक दोस्त ने सर हिलाया. जोश में बोला, राहुल बिलकुल सही कह रहे हो. ये तो मैंने सोचा ही नहीं था. वो साला तो सच में कमीना निकला. &lt;br /&gt;दूसरा दोस्त (रवि) तिलमिला उठा. राहुल बाबू! हम यहाँ पीने आये थे, और तुम या तो इस मुद्दे पे बहस मत करो, राम जी के खिलाफ कुछ बोलो नहीं, या यहाँ से उठकर चले जाओ.  मैंने कहा, भाई बहस मैनें शुरू नहीं की है. जो मुझसे सहमत था वो कूद पडा, बोला, राहुल को कुछ मत बोलिए. वो सही कह रहा है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;रवि को लग रहा था कि अगर राहुल कुछ देर और ठहर गया तो मार-पीट की नौबत आ जायेगी क्यूंकि बाक़ी लोग भी लाल हो रहे थे. उसने कहा, राहुल बाबू आप जाईए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दारु चल रही थी, पैग दर पैग बन रहे थे, सिगरेट के सिगरेट जल रहे थे, और बहस का रंग भी बदलता जा रहा था. गुलाबी आँखों से अब मर-पीट की नौबत. मै मन ही मन मुस्कुरा रहा था. इतने में मेरा समर्थक गरम हो गया. राहुल जाएगा, उससे पहले मैं जाऊंगा. रवि का चूँकि वो ख़ास था सो उसे रोकने की कोशिश की गयी. उसने कीचन से छूरा निकाल लिया. मुझे कोई मत रोको, मै मार डालूँगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामला गंभीर होने लगा. वो किसी की सुनने को तैयार नहीं था. दो घंटे तक उसकी मान-मन्नव्वल चली तब जाकर कहीं वो माना. मैंने भी वहाँ से खिसकना उचित समझा. दारु के नशे में भक्तों की ऐसी श्रद्घा कहाँ देखने को मिलेगी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-1705668827196408107?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/1705668827196408107/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1705668827196408107'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1705668827196408107'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='दारू की खुमारी और देवता की याद'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/StApqEDYU6I/AAAAAAAAADM/ATzh5O3jeWI/s72-c/20.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-1070892212183493811</id><published>2009-08-13T13:47:00.001-07:00</published><updated>2009-10-10T01:32:01.802-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाकिस्तान'/><title type='text'>प्यारे भाई पाकिस्तान</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://api.ning.com/files/plBVxercOCK5bSgc8tpE3KGtuSwbwqk*Tb2BO-rCI5Jz-*WJ8aTNAlUpiB2mKBN5kJdw4IRVFLZ2JsaxejD5*kyam4imMMN5/PakistanFlag.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 691px; height: 455px;" src="http://api.ning.com/files/plBVxercOCK5bSgc8tpE3KGtuSwbwqk*Tb2BO-rCI5Jz-*WJ8aTNAlUpiB2mKBN5kJdw4IRVFLZ2JsaxejD5*kyam4imMMN5/PakistanFlag.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्यारे भाई पाकिस्तान,&lt;br /&gt;जन्मदिन की बासठवीं साल गिरह मुबारक हो..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै तुमसे कभी अलग नहीं होना चाहता था, आखिर तुम और मैं तो एक ही थे ना, लेकिन इन लोगों का क्या करें जिन्होंने मजहब के नाम पर हमें एक से दो कर दिया. खैर, बताओ तुम कैसे हो? मुझे मालूम है इनदिनों तुम कुछ मुश्किल दौर में गुजर रहे हो, क्या बताऊँ मै भी तो वैसी ही हालत में हूँ. एक वो वक़्त था जब विस्मिल, भगत, और राजगुरु सब एक साथ मिलकर लड़ रहे थे, कोई जाती नहीं, कोई मजहब नहीं जो उन्हें अलग कर पाता. जैसे ही अंग्रेजों को हमारे सपूतों ने मार भगाया, वैसे ही इंसान की मतलब परस्ती सामने आने लगी.. और फिर हमें बाँट दिया गया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब चूँकि हकीकत यही है, तो हमें इसी सच के साथ जीना होगा, तुम्हारी खबर मुझे मिलती रहती है, मै भी ठीक-ठाक ही हूँ.. तुम्हारे साथ इतनी तो खुशकिस्मती है कि तुम्हारे जन्मदिन की बधाई तुम्हारे लोग तुम्हारी जुबां में देते हैं, मेरी तो किस्मत ऐसी हो गयी है.. ख़ास मेरी आज़ादी के दिन भी, विलायती भाषा बोली जाती है.. जिसे मेरे लोग समझते नहीं.. बस देखते हैं.. करोडो रूपये ऐसे ही फूक देते हैं तोपों की सलामी और बेमतलब की शान में.. तुम भी परेशानी में हो मुझे पता है.. हमारे हाथ में कुछ है भी तो नहीं.. चलो एक बार फिर से ये उम्मीद करते हैं कि इन लोगों के दिमाग से मजहब का फितूर निकल जायें..आपस में लड़ने-झगड़ने की बजाय ये मिलकर चलें.. भाई! कश्मीर का मसला तो मेरे समझ में ही नहीं आता.. जब हमें लोगों की बात पर बाँट दिया गया.. तो चलो उसे भी बाँट दो.. वहां के लोगों से पूछ लो.. क्या चाहते हैं... खैर ये सब तो इन्ही पर निर्भर है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलो छोडो इन दर्द भरी बातों को और डूब जाओ आज़ादी के जश्न में... झूमो.. नाचो.. गाओ.. रोने का फायदा ही क्या है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा भाई&lt;br /&gt;हिन्दुस्तान.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-1070892212183493811?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/1070892212183493811/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post_13.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1070892212183493811'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1070892212183493811'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post_13.html' title='प्यारे भाई पाकिस्तान'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-8063001011541883650</id><published>2009-08-12T14:11:00.000-07:00</published><updated>2009-10-10T01:31:29.422-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गीत'/><title type='text'>मुल्क से पहचान अपनी, है वतन ये जान अपनी,</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://farm1.static.flickr.com/45/128225160_8536ea8cf3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 500px; height: 326px;" src="http://farm1.static.flickr.com/45/128225160_8536ea8cf3.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मुल्क से पहचान अपनी,&lt;br /&gt;है वतन ये जान अपनी,&lt;br /&gt;मजहबों को भूल जाएँ,&lt;br /&gt;बस ज़मीं हो प्राण अपनी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ ये निश्चय करें हम,&lt;br /&gt;साथ ही मिलकर रहें हम,&lt;br /&gt;हो अमन ही धर्म  अपना,&lt;br /&gt;प्रेम से बंधकर चलें हम,&lt;br /&gt;हिन्दू ना कोई, सिख कोई ना,&lt;br /&gt;और ना कोई जात अपनी,&lt;br /&gt;मुल्क से पहचान अपनी..&lt;br /&gt;है वतन ये जान अपनी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद चल कर लें उन्हें&lt;br /&gt;जो हंसते-हंसते चल पड़े,&lt;br /&gt;इस वतन के वास्ते जो,&lt;br /&gt;सूली पे भी चढ़ गए,&lt;br /&gt;उनके जैसे ही हमेशा,&lt;br /&gt;हो ज़मीं ये शान अपनी,&lt;br /&gt;मुल्क से पहचान अपनी,&lt;br /&gt;है वतन ये जान अपनी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्य के थे वो पुजारी,&lt;br /&gt;और अहिंसा में भरोसा,&lt;br /&gt;जाती-मजहब छोड़ कर सब,&lt;br /&gt;संग थे उनके हमेशा,&lt;br /&gt;उनके रस्ते पर चले हम,&lt;br /&gt;देश ही हो आन अपनी,&lt;br /&gt;मुल्क से पहचान अपनी,&lt;br /&gt;है वतन ये जान अपनी,&lt;br /&gt;मजहबों को भूल जाएँ,&lt;br /&gt;बस ज़मीं हो प्राण अपनी..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-8063001011541883650?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/8063001011541883650/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post_12.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/8063001011541883650'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/8063001011541883650'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post_12.html' title='मुल्क से पहचान अपनी, है वतन ये जान अपनी,'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://farm1.static.flickr.com/45/128225160_8536ea8cf3_t.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-763238024464089631</id><published>2009-08-10T08:30:00.000-07:00</published><updated>2009-10-10T01:29:11.841-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म की क्षय'/><title type='text'>तुम्हारे धर्म की क्षय (भाग दो)</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/SoBEYg5cetI/AAAAAAAAAC8/h86_4yCo63g/s1600-h/religion.gif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 198px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/SoBEYg5cetI/AAAAAAAAAC8/h86_4yCo63g/s200/religion.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368365943764056786" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आपने &lt;a href="http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post.html"&gt;“तुम्हारे धर्म की क्षय (भाग एक)”&lt;/a&gt; पढ़ा.. इससे आगे का अंश पेश कर रहा हूँ, आपके तवक्को की ख़ास ज़रूरत है.. उम्मीद है राहुल सांस्कृत्यायन जी का यह आलेख आपको सोचने पर विवश करेगा.. मजहब की दकियानूसी औक़ात खत्म करने की मेरी इस कोशिश में आपका साथ अपेक्षित है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने के लिए तो हिन्दुओं पर ताना कसते हुए इस्लाम कहता है कि हमने जात-पाँत के बन्धनों को तोड़ दिया। इस्लाम में आते ही सब भाई-भाई हो जाते हैं। लेकिन क्या यह बात सच है? यदि ऐसा होता तो आज मोमिन (जुलाहा), अप्सार (धुनिया), राइन (कुँजड़ा) आदि का सवाल न उठता। अर्जल और अशरफ का शब्द किसी के मुँह पर न आता। सैयद-शेख, मलिक-पठान, उसी तरह का ख्याल अपने से छोटी जातियों से रखते हैं, जैसा कि हिन्दुओं के बड़ी जात वाले। खाने के बारे में छूतछात कम है और वह तो अब हिन्दुओं में भी कम होता जा रहा है। लेकिन सवाल तो है सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्र में इस्लाम की बड़ी जातों ने छोटी जातों को क्या आगे बढ़ने का कभी मौका दिया? धार्मिक नेता हों, तो बड़ी-बड़ी जातों से शाही दरबार और सरकारी नौकरियाँ सभी जगहें बड़ी जातों के लिए सुरक्षित रहीं। जमींदार, ताल्लुकेदार, नवाब सभी बड़ी जातों के हैं। हिन्दुस्तानियों में से चार-पाँच करोड़ आदमियों ने हिन्दुओं के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक अत्याचारों से त्राण पाने के लिए इस्लाम की शरण ली। लेकिन, इस्लाम की बड़ी जातों ने क्या उन्हें वहाँ पनपने दिया? सात सौ बरस बाद भी आज गाँव का मोमिन जमींदारों और बड़ी जातों के जुल्म का वैसा ही शिकार है, जैसा कि उसका पड़ोसी कानू-कुर्मी। हिन्दुओं से झगड़ कर अंग्रेजों की खुशामद करके कौन्सिलों की सीटों, सरकारी नौकरियों में अपने लिए संख्या सुरक्षित करायी जाती है। लेकिन जब उस संख्या को अपने भीतर वितरण करने का अवसर आता है, तब उनमें से प्रायः सभी को बड़ी जाति वाले सैयद और शेख अपने हाथ में ले लेते हैं। साठ-साठ, सत्तर-सत्तर फीसदी संख्या रखने वाले मोमिन और अन्सार मुँह ताकते रह जाते हैं। बहाना किया जाता है कि उनमें उतनी शिक्षा नहीं। लेकिन सात सौ और हजार बरस बाद भी यदि वे शिक्षा में इतने पिछड़े हुए हैं, तो इसका दोष किसके ऊपर है? उन्हें कब शिक्षित होने का अवसर दिया गया? जब पढ़ाने का अवसर आया, छात्रावृत्ति देने का मौका आया, तब तो ध्यान अपने भाई-बन्धुओं की तरफ चला गया। मोमिन और अन्सार, बावर्ची और चपरासी, खिदमतगार और हुक्काबरदार के काम के लिए बने हैं। उनमें से कोई यदि शिक्षित हो भी जाता है, तो उसकी सिफारिश के लिए अपनी जाति में तो वैसा प्रभावशाली व्यक्ति है नहीं; और, बाहर वाले अपने भाई-बन्धु को छोड़कर उन पर तरजीह क्यों देने लगे? नौकरियों और पदों के लिए इतनी दौड़धूप, इतनी जद्दोजहद सिर्फ खिदमते-कौम और देश सेवा के लिए नहीं है, यह है रुपयों के लिए, इज्जत और आराम की जिन्दगी बसर करने के लिए।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिन्दू और मुसलमान फरक-फरक धर्म रखने के कारण क्या उनकी अलग जाति हो सकती है? जिनकी नसों में उन्हीं पूर्वजों का खून बह रहा है जो इसी देश में पैदा हुए और पले, फिर दाढ़ी और चुटिया, पूरब और पश्चिम की नमाज क्या उन्हें अलग कौम साबित कर सकती है? क्या खून पानी से गाढ़ा नहीं होता? फिर हिन्दू और मुसलमान के फरक से बनी इन अलग-अलग जातियों को हिन्दुस्तान से बाहर कौन स्वीकार करता है? जापान में जाइये या जर्मनी, ईरान जाइये या तुर्की सभी जगह हमें हिन्दी और ‘इण्डियन’ कहकर पुकारा जाता है। जो धर्मभाई को बेगाना बनाता है, ऐसे धर्म को धिक्कार! जो मजहब अपने नाम पर भाई का खून करने के लिए प्रेरित करता है, उस मजहब पर लानत! जब आदमी चुटिया काट दाढ़ी बढ़ाने भर से मुसलमान और दाढ़ी मुड़ा चुटिया रखने मात्रा से हिन्दू मालूम होने लगता है, तो इसका मतलब साफ है कि यह भेद सिर्फ बाहरी और बनावटी है। एक चीनी चाहे बौद्ध हो या मुसलमान, ईसाई हो या कनफूसी, लेकिन उसकी जाति चीनी रहती है; एक जापानी चाहे बौद्ध हो या शिन्तो-धर्मी, लेकिन उसकी जाति जापानी रहती है; एक ईरानी चाहे वह मुसलमान हो या जरतुस्त, किन्तु वह अपने लिए ईरानी छोड़ दूसरा नाम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। तो हम-हिन्दियों के मजहब को टुकड़े-टुकड़े में बाँटने को क्यों तैयार हैं और इस नाजायज हरकतों को हम क्यों बर्दाश्त करें?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;धर्मों की जड़ में कुल्हाड़ा लग गया है; और, इसलिए अब मजहबों के मेलमिलाप की बातें कभी-कभी सुनने में आती हैं। लेकिन, क्या यह सम्भव है? &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;”मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना“ इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना अगर मजब बैर नहीं सिखाता तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क पामाल क्यों है? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिये, आज भी हिन्दुस्तान के शहरों और गाँवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा है? कौन गाय खाने वालों को लड़ा रहा है। असल बात यह है ”मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का खून पीना।“ हिन्दुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसका, मौत को छोड़कर इलाज नहीं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक तरफ तो वे मजहब एक-दूसरे के इतने जबर्दस्त खून के प्यासे हैं। उनमें से हर एक एक-दूसरे के खिलाफ शिक्षा देता है। कपड़े-लत्ते, खाने-पीने, बोली-बानी, रीति-रिवाज में हर एक एक-दूसरे से उल्टा रास्ता लेता है। लेकिन, जहाँ गरीबों को चूसने और धनियों की स्वार्थ-रक्षा का प्रश्न आ जाता है; तो दोनों बोलते हैं। गदहा-गाँव के महाराज बेवकूफ बख्श सिंह सात पुश्त से पहले दर्जे के बेवकूफ चले आते हैं। आज उनके पास पचास लाख सालाना आमदनी की जमींदारी है जिसको प्राप्त करने में न उन्होंने एक धेला अकल खर्च की और न अपनी बुद्धि के बल पर उसे छै दिन चला ही सकते हैं। न वे अपनी मेहनत से धरती से एक छटाँक चावल पैदा कर सकते हैं, न एक कंकड़ी गुड़। महाराज बेवकूफ बख्श सिंह को यदि चावल, गेहूँ, घी, लकड़ी के ढेर के साथ एक जंगल में अकेले छोड़ दिया जाये, तो भी उनमें न इतनी बुद्धि है और न उन्हें काम का ढंग मालूम है कि अपना पेट भी पाल सकें; सात दिन में बिल्ला-बिल्ला कर जरूर वे वहीं मर जायेंगे। लेकिन आज गदहा गाँव में महाराज दस हजार रुपया महीना तो मोटर के तेल में फूँक डालते हैं। बीस-बीस हजार रुपये जोड़े कुत्ते उनके पास हैं। दो लाख रुपये लगाकर उनके लिए महल बना हुआ है। उन पर अलग डाक्टर और नौकर हैं। गर्मियों में उनके घरों में बरफ के टुकड़े और बिजली के पंखे लगते हैं। महाराज के भोजन-छाजन की तो बात ही क्या? उनके नौकरों के लिए नौकर भी घी-दूध में नहाते हैं, और जिस रुपये को इस प्रकार पानी की तरह बहाया जाता है, वह आता कहाँ से है? उसके पैदा करने वाले कैसी जिन्दगी बिताते हैं? वे दाने-दाने को मुहताज हैं। उनके लड़कों को महाराज बेवकूफ बख्श के कुत्तों का जूठा भी यदि मिल जाये, तो वे अपने को धन्य समझें।&lt;br /&gt;लेकिन, यदि किसी धर्मानुयायी से पूछा जाये, कि ऐसे बेवकूफ आदमी को बिना हाथ-पैर हिलाये दूसरे की कसाले की कमाई को पागल की तरह फेंकने का क्या अधिकार है तो पण्डित जी कहेंगे ”अरे वे तो पूर्व की कमाई खा रहे हैं। भगवान की ओर से वे बड़े बनाये गये हैं। शास्त्र-वेद कहते हैं कि बड़े-छोटे के बनाने वाले भगवान हैं। गरीब दाने-दाने को मारा-मारा फिरता है, यह भगवान की ओर से उसको दण्ड मिला है।“ यदि किसी मौलवी या पादरी से पूछिये तो जवाब मिलेगाµ”क्या तुम काफिर हो, नास्तिक तो नहीं हो? अमीर-गरीब दुनिया का कारबार चलाने के लिए खुदा ने बनाये हैं। राजी-ब-रजा ख्शुदा की मर्जी में इन्सान का दखल देने का क्या हक? गरीबी को न्यामत समझो। उसकी बन्दगी और फरमाबरदारी बजा लाओ, कयामत में तुम्हें इसकी मजदूरी मिलेगी।“ पूछा जाय जब बिना मेहनत ही के महाराज बेवकूफ बख्श सिंह धरती पर ही स्वर्ग आनन्द भोग रहे हैं तो ऐसे ‘अँधेर नगरी चैपट राजा’ के दरबार में बन्दगी और फरमाबरदारी से कुछ होने-हवाने की क्या उम्मीद?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-763238024464089631?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/763238024464089631/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post_10.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/763238024464089631'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/763238024464089631'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post_10.html' title='तुम्हारे धर्म की क्षय (भाग दो)'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/SoBEYg5cetI/AAAAAAAAAC8/h86_4yCo63g/s72-c/religion.gif' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-350373639200572176</id><published>2009-08-09T08:48:00.000-07:00</published><updated>2009-10-10T01:30:26.238-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुल्क की मय्यत'/><title type='text'>मुल्क की मय्यत में आना होगा...</title><content type='html'>अफवाहों के बाज़ार में,&lt;br /&gt;आजकल, समाचार में,&lt;br /&gt;महसूद है सुर्खियों में,&lt;br /&gt;टीवी और अखबार में,&lt;br /&gt;बेतुल्लाह भी,&lt;br /&gt;हकीमुल्लाह भी...&lt;br /&gt;पीठ थपथपाने का दौर है,&lt;br /&gt;औपचारिकताएं अभी और है,&lt;br /&gt;जो खबर अभी अपुष्ट है,&lt;br /&gt;उससे जनता संतुष्ट है,&lt;br /&gt;और उस खबर की कहाँ फिकर है,&lt;br /&gt;जहां अध-नंगों, भूखों का ज़िकर है,&lt;br /&gt;रोटी के अभाव में कोई मरता है,&lt;br /&gt;रोज़ी के तलाश में कोई सड़ता है,&lt;br /&gt;हर दिन इंसानियत का बलात्कार,&lt;br /&gt;भी तो बनता है समाचार,&lt;br /&gt;कभी शरीर से, कभी व्यवहार से,&lt;br /&gt;कभी भूख से, कभी विचार से,&lt;br /&gt;कौन सोचेगा,&lt;br /&gt;क्यूँ सोचेगा,&lt;br /&gt;सोचने के लिए इतने तो मसले हैं,&lt;br /&gt;कभी ताज, कभी स्वात पे हमले हैं,&lt;br /&gt;मन लो जश्न मेरे दोस्त,&lt;br /&gt;मातम भी मनाना होगा,&lt;br /&gt;अपने घर में गर ना झांका,&lt;br /&gt;मुल्क की मय्यत में आना होगा...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-350373639200572176?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/350373639200572176/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post_6310.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/350373639200572176'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/350373639200572176'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post_6310.html' title='मुल्क की मय्यत में आना होगा...'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-2318225198391064832</id><published>2009-08-09T05:52:00.001-07:00</published><updated>2009-10-10T01:29:48.027-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अब होश लिखो'/><title type='text'>ऊपर वाले का कुछ ऐसा "राहुल", दोष लिखो...</title><content type='html'>लिखा बहुत है प्रेम, ज़रा आक्रोश लिखो,&lt;br /&gt;मार-काट मच जाए, ऐसा रोष लिखो,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनियादारी बहुत लिखी और लिखा अमन,&lt;br /&gt;भड़क उठे भावनाएं, ऐसा जोश लिखो,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहानुभूति है लिखी बहुत, पीड़ितों हेतु,&lt;br /&gt;खड़े हो सकें वो, ऐसा उदघोष लिखो,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अल्लाह-ओ-अकबर, राम-नाम, सब ख़त्म करो,&lt;br /&gt;इंसान बने इंसान, चलो कि अब होश लिखो,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजहब के ठेकेदार सभी हो जाएँ सन्न,&lt;br /&gt;ऊपर वाले का कुछ ऐसा "राहुल", दोष लिखो...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' 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rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-2130746385276661078</id><published>2009-08-08T21:00:00.000-07:00</published><updated>2009-10-10T01:28:38.167-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म की क्षय'/><title type='text'>तुम्हारे धर्म की क्षय (भाग एक)</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.topnews.in/files/Mumbai-terror-attack.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 584px; height: 374px;" src="http://www.topnews.in/files/Mumbai-terror-attack.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_9nTItnS3VNk/R8blGp-TbhI/AAAAAAAAQK8/kdRLovdbsiI/s400/India+Gujarat+genocide+2002.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 275px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_9nTItnS3VNk/R8blGp-TbhI/AAAAAAAAQK8/kdRLovdbsiI/s400/India+Gujarat+genocide+2002.bmp" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/01871787984864513003"&gt;सन्दीप भाई &lt;/a&gt; की मदद से ये बेह्तरीन आलेख मिला, ये आलेख थोड़ा बड़ा है सो दो भागों में पेश कर रहा हूँ, गौर फ़रमायिएगा..&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• राहुल सांकृत्यायन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो धर्मों में आपस में मतभेद है। एक पूरब मुँह करके पूजा करने का विधान करता है, तो दूसरा पश्चिम की ओर। एक सिर पर कुछ बाल बढ़ाना चाहता है, तो दूसरा दाढ़ी। एक मूँछ कतरने के लिए कहता है, तो दूसरा मूँछ रखने के लिए। एक जानवर का गला रेतने के लिए कहता है, तो दूसरा एक हाथ से गर्दन साफ करने को। एक कुर्ते का गला दाहिनी तरफ रखता है, तो दूसरा बाईं तरफ। एक जूठ-मीठ का कोई विचार नहीं रखता, तो दूसरे के यहाँ जाति के भी बहुत-से चूल्हे हैं। एक खुदा के सिवा दूसरे का नाम भी दुनिया में रहने नहीं देना चाहता, तो दूसरे के देवताओं की संख्या नहीं। एक गाय की रक्षा के लिए जान देने को कहता है, तो दूसरा उसकी कुर्बानी से बड़ा सबाब समझता है।&lt;br /&gt;इसी तरह दुनिया के सभी मजहबों में भारी मतभेद है। ये मतभेद सिर्फ विचारों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि पिछले दो हजार वर्षों का इतिहास बतला रहा है कि इन मतभेदों के कारण मजहबों ने एक-दूसरे के ऊपर जुल्म के कितने पहाड़ ढाये। यूनान और रोम के अमर कलाकारों की कृतियों का आज अभाव क्यों दिखता है? इसलिए कि वहाँ एक मजहब आया जो ऐसी मूर्तियों के अस्तित्व को अपने लिए खतरे की चीज समझता था। ईरान की जातीय कला, साहित्य और संस्कृति को नामशेष-सा क्यों हो जाना पड़ा? क्योंकि, उसे एक ऐसे मजहब से पाला पड़ा जो इन्सानियत का नाम भी धरती से मिटा देने पर तुला हुआ था। मेक्सिको और पेरू, तुर्किस्तान और अफगानिस्तान, जहाँ भी देखिये, मजहबों ने अपने को कला, साहित्य, संस्कृति का दुश्मन साबित किया, और कितना खून-खराबा किया इसके लिए तो पूछिये मत। अपने-अपने खुदा और भगवान के नाम पर, अपनी-अपनी किताबों और पाखण्डों के नाम पर मनुष्य के खून को उन्होंने पानी से भी सस्ता कर दिखलाया। यदि पुराने यूनानी धर्म के नाम पर निरपराध ईसाई बच्चे बूढ़ों, स्त्री-पुरुषों को शेरों से फड़वाना, तलवार के घाट उतारना बड़े पुण्य का काम समझते थे, तो पीछे अधिकार हाथ आने पर ईसाई भी क्या उनसे पीछे रहे? ईसामसीह के नाम पर उन्होंने खुलकर तलवार का इस्तेमाल किया। जर्मनी में इन्सानियत के भीतर लोगों को लाने के लिए कत्ले-आम-सा मचा दिया गया। पुराने जर्मन ओक वृक्ष की पूजा करते थे। कहीं ऐसा न हो कि ये ओक ही उन्हें फिर पथभ्रष्ट कर दें, इसके लिए बस्तियों के आसपास एक भी ओक को रहने न दिया गया। पोप और पेत्रायार्क, इंजील और ईसा के नाम पर प्रतिभाशाली व्यक्तियों के विचार-स्वातंत्रय को आग और लोहे के जरिये से दबाते रहे। जरा से विचार-भेद के लिए कितनों को चर्खी से दबाया गया कितनों को जीते जी आग में जलाया गया। हिन्दुस्तान की भूमि ऐसी धार्मिक मतान्धता का कम शिकार नहीं रही है। इस्लाम के आने से पहले भी क्या मजहब ने मन्त्रा के बोलने और सुनने वालों के मुँह और कानों में पिघले राँगे और लाख को नहीं भरा? शंकराचार्य ऐसे आदमी जो कि सारी शक्ति लगा गला फाड़-फाड़ कर यही चिल्लाते रहे थे कि सभी ब्रह्म हैं, ब्रह्म से भिन्न सभी चीजें झूठी हैं तथा रामानुज और दूसरों के भी दर्शन जबानी जमा-खर्च से आगे नहीं बढ़े, बल्कि सारी शक्ति लगाकर शूद्रों और दलितों को नीचे दबा रखने में उन्होंने कोई कोर-कसर उठा नहीं रखी थी और इस्लाम के आने के बाद तो हिन्दू-धर्म और इस्लाम के खूँरेज झगड़े आज तक चल रहे हैं। उन्होंने तो हमारे देश को अब तक नरक बना रखा है। कहने के लिए इस्लाम शक्ति और विश्व-बंधुत्व का धर्म कहलाता है; हिन्दू-धर्म ब्रह्मज्ञान और सहिष्णुता का धर्म बतलाया जाता है; किन्तु क्या इन दोनों धर्मों ने अपने इस दावे को कार्यरूप में परिणत करके दिखलाया? हिन्दू मुसलमानों पर दोष लगाते हैं कि ये बेगुनाहों का खून करते हैं; हमारे मन्दिरों और पवित्र तीर्थों को भ्रष्ट करते हैं; हमारी स्त्रियों को भगा ले जाते हैं। लेकिन, झगड़े में क्या हिन्दू बेगुनाहों का खून करने से बाज आते हैं। चाहे आप कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम झगड़े को ले लीजिये या बनारस के, इलाहाबाद के या आगरे के; सब जगह देखेंगे कि हिन्दुओं और मुसलमानों के छुरे और लाठियों के शिकार हुए हैं, निरपराध, अजनबी स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे। गाँव या दूसरे मुहल्ले का कोई अभागा आदमी अनजाने उस रास्ते आ गुजरा और कोई पीछे से छूरा भोंक कर चम्पत हो गया। सभी धर्म दया का दावा करते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के इस धार्मिक झगड़ों को देखिये, तो आपको मालूम होगा कि यहाँ मनुष्यता पनाह माँग रही है। निहत्थे बूढ़े और बूढ़ियाँ ही नहीं, छोटे-छोटे बच्चे तक मार डाले जाते हैं। अपने धर्म के दुश्मनों को जलती आग में फेंकने की बात अब भी देखी जाती है।&lt;br /&gt;एक देश और एक खून मनुष्य को भाई-भाई बनाते हैं। खून का नाता तोड़ना अस्वाभाविक है, लेकिन हम हिन्दुस्तान में क्या देखते हैं? हिन्दुओं की सभी जातियों में, चाहे आरम्भ में कुछ भी क्यों न रहा हो अब तो एक ही खून दौड़ रहा है; क्या शकल देखकर किसी के बारे में आप बतला सकते हैं कि यह ब्राह्मण है और यह शूद्र। कोयले से भी काले ब्राह्मण आपको लाखों की तादात में मिलेंगे। और शूद्रों में भी गेहुएँ रंग वालों का अभाव नहीं है। पास-पास में रहने वाले स्त्राी-पुरुषों के यौन-सम्बन्ध, जाति की ओर से हजार रुकावट होने पर भी, हम आये दिन देखते हैं। कितने ही धनी खानदानों, राजवंशों के बारे में तो लोग साफ कहते हैं कि दास का लड़का राजा और दासी का लड़का राजपुत्रा। इतना होने पर भी हिन्दू-धर्म लोगों को हजारों जातियों में बाँटे हुए हैं। कितने ही हिन्दू, हिन्दू के नाम पर जातीय एकता स्थापित करना चाहते हैं। किन्तु, वह हिन्दू जातीयता है कहाँ? हिन्दू जाति तो एक काल्पनिक शब्द है। वस्तुतः वहाँ हैं ब्राह्मणµब्राह्मण भी नहीं, शाकद्वीपी, सनाढ्य, जुझौतियाµराजपूत, खत्राी, भूमिहार, कायस्थ, चमार आदि-आदि...। एक राजपूत का खाना-पीना, ब्याह-श्राद्ध अपनी जाति तक सीमित रहता है। उसकी सामाजिक दुनिया अपनी जाति तक महमूद है। इसीलिए जब एक राजपूत बड़े पद पर पहुँचता है, तो नौकरी दिलाने, सिफारिश करने या दूसरे तौर से सबसे पहले अपनी जाति के आदमी को फायदा पहुँचाना चाहता है। यह स्वाभाविक है। जब कि चैबीसों घण्टे मरने-जीने सबमें सम्बन्ध रखने वाले अपने बिरादरी के लोग हैं, तो किसी की दृष्टि दूर तक कैसे जायेगी?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-2130746385276661078?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/2130746385276661078/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/2130746385276661078'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/2130746385276661078'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='तुम्हारे धर्म की क्षय (भाग एक)'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_9nTItnS3VNk/R8blGp-TbhI/AAAAAAAAQK8/kdRLovdbsiI/s72-c/India+Gujarat+genocide+2002.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-7215826007876864033</id><published>2009-06-27T09:17:00.002-07:00</published><updated>2009-10-10T01:27:55.766-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बंदगी'/><title type='text'>तेरी बंदगी देखकर, मैं झुक गया मेरे भाई..</title><content type='html'>वो कहता है, वाह! क्या माल है?&lt;br /&gt;कुड़ी ग़ज़ब है, बेमिसाल है,&lt;br /&gt;उसकी फीगर! ओह! काश! एक रात के लिए!&lt;br /&gt;आ जाती, जवानी की उठी प्यास के लिए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी मर्दानगी का अहसास है उसे,&lt;br /&gt;पर खुदा का भी आभास है उसे,&lt;br /&gt;कहता है, राहुल भाई मैं अल्लाह के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकता,&lt;br /&gt;उनके खिलाफ एक कदम भी नहीं चल सकता,&lt;br /&gt;उनकी तौहीन मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता,&lt;br /&gt;हाँ! मगर नमाज़ नहीं पढ़ सकता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज तक मैंने औरतों की इज्ज़त नहीं की,&lt;br /&gt;उनसे कभी मोहब्बत नहीं की,&lt;br /&gt;उनके साथ रोमांस किया,&lt;br /&gt;रात को पब में डांस किया,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर चूँकि मैं अल्लाह की ना-फ़रमानी नहीं कर सकता,&lt;br /&gt;उनके कायदों को नहीं तोड़ सकता,&lt;br /&gt;इसलिए आज तक किसी औरत के साथ ज़ना नहीं किया,&lt;br /&gt;पर हाँ स्मूच के लिए उन्हें मना नहीं किया,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीयर पी लेता हूँ, पर शराब तो हराम है,&lt;br /&gt;नज़रों से बलात्कार करो, पर बिस्तर पे हराम है,&lt;br /&gt;वाह रे मेरे सच्चे मुसलमान भाई,&lt;br /&gt;तेरी बंदगी देखकर, मैं झुक गया मेरे भाई..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-7215826007876864033?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/7215826007876864033/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/06/blog-post_27.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/7215826007876864033'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/7215826007876864033'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/06/blog-post_27.html' title='तेरी बंदगी देखकर, मैं झुक गया मेरे भाई..'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-6540533793556404258</id><published>2009-06-17T19:11:00.000-07:00</published><updated>2009-10-10T01:27:29.509-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ढोंग'/><title type='text'>सब हवसी, कपटी, पाखंडी है....</title><content type='html'>&lt;p&gt;विप्र, मुल्ला, पादरी सब,&lt;br /&gt;हैं चोर की बिरादरी सब,&lt;br /&gt;मूढ़ तुलसी कहता है कि नारी,&lt;br /&gt;होती है त्रिया चरित्र वाली,&lt;br /&gt;और कुरान में कहीं इस बात का उल्लेख है,&lt;br /&gt;नारियां नर की ख़रीदी हुई एक खेत है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हर कहानी ग्रन्थ की सिर्फ एक षडयंत्र है,&lt;br /&gt;झूठ हर इक तंत्र, और ढोंग हर इक मंत्र है,&lt;br /&gt;षडयंत्र है ये, अधिकार हनन करने का,&lt;br /&gt;नारी शक्ति और मान मर्दन करने का, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इबादत करना भी गुनाह है बैठ मर्दों के संग,&lt;br /&gt;अल्लाह के दरबार का यह कैसा ढंग?&lt;br /&gt;हवसी है पंडित, उसे क्यूँ भगवान् का डर,&lt;br /&gt;वैश्या बनाता बच्चियों को देवदासी कहकर,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हर मजहब एक-दूजे का संगी है,&lt;br /&gt;सब हवसी, कपटी, पाखंडी है.... &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-6540533793556404258?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/6540533793556404258/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/06/blog-post_17.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/6540533793556404258'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/6540533793556404258'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/06/blog-post_17.html' title='सब हवसी, कपटी, पाखंडी है....'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6583190417627870392.post-1247126955263697957</id><published>2009-04-19T05:46:00.000-07:00</published><updated>2009-10-10T01:25:51.557-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माथा-पच्ची'/><title type='text'>उपर वाले की लैंग्वेज</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इन दिनों माथा-पच्ची में लगा हूं कि क्या होगी उपर वाले की लैंग्वेज. हिन्दू भाई के भगवान ने सृष्टि रची, मुस्लिम भाई के अल्लाह ने जहाँ बनाया, और इसाई दोस्तों के जीसस ने अर्थ को क्रिएट किया. घूम-फिर कर मैं यहाँ तक पहुंचा कि भैया धरती तो पूरे ब्रह्मांड में इकलौती ग्रह ही है. और जब धरती एक है तो स्वर्ग-नर्क, जन्नत-जह्हनुम, और हैवेन-हेल भी एक ही होगा. मानने वाली बात होती अगर यह कहा जाता कि सारे धर्म के मुखिया ने मिलकर एक मीटिंग की और विचार-विमर्श के बाद निर्माण कार्य शुरु किया. मगर कोई ऐसा कहता नहीं मिलता!&lt;br /&gt;जहाँ तक मेरा दिमाग चला कि इनमें से किसी एक ने ही इसे बनाया है. या यह भी हो सकता है कि जिस एक ने इसे बनाया उसे ही हम अलग अलग नामों से पुकारते हैं. तो जहाँ पहुंच कर मेरा माथा काम करना बंद कर देता है वो है लैंग्वेज. जैसा कि पुरोहित फ़रमाते हैं, पुन्य करोगे तो मरने के बाद स्वर्ग में जाओगे जहाँ ऐशो-आराम होगा, और पाप करने पर नर्क चले जाओगे. उसी तरह मौलवी साहब इंसान को जन्नत-जहन्नुम के &lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/SesfY91khhI/AAAAAAAAAAM/DvLdeJwqS48/s1600-h/DSC_0123.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5326385498072319506" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 189px; CURSOR: hand; HEIGHT: 172px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/SesfY91khhI/AAAAAAAAAAM/DvLdeJwqS48/s320/DSC_0123.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बारे&lt;/span&gt; में बताते हैं और इसी तर्ज पर हैवेन-हेल की कहानी है. अब जैसा कि पहले ही तय हो चुका है यह सब एक ही चिड़िया के अलग-अलग नाम हैं.&lt;br /&gt;सवाल यह है कि इस एक धरती पर कई देश हैं. और हर देश की अलग-अलग भाषाएं. नज़ीर के तौर पर सिर्फ़ भारत की बात करें तो यहां १२ मुख्य भाषाओं के साथ-साथ हज़ारों बोलियों का चलन है. अंदाज़ा लगा लें कि समूची दुनिया में कितनी भाषाएं होगी. अब अगर अमेरिका का कोई दोस्त मरता है और उपर पहुंचता है तो वो बेचारा अंग्रेजी में बात करता होगा क्युंकि उसे तो सिर्फ़ अंग्रेजी आती है. सऊदी-अरब के किसी शाह का इंतकाल होगा तो वो जनाब भी सिर्फ़ अरबी मे ही बात करते होंगे. और तो और भारत में तो इतनी भाषाएं हैं कि मरने पर वो अपने भगवान से तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, हिंदी, पंजाबी, उर्दू, बंगला, उड़िया और नाजाने कितनी और लैंग्वेजों में बात करते होंगे.&lt;br /&gt;गोया ऐसा तो है नहीं कि उपर जाकर उनकी बोली बदल जायेगी, या वो मौन धारण कर लेंगे. तो फिर कौन सी लैंग्वेज में बात करते होंगे ये सब? चुंकि उपर बैठा मालिक तो एक ही है, उसकी भाषा क्या होगी? क्या वो बहु-भाषाविद है? क्या वो समय के साथ-साथ अपनी भाषा को अपडेट करते होंगे? क्या उन्होनें स्वर्ग-नर्क में दुभाषियों को रोज़गार दिया हुआ है? ऐसे बहुत सारे प्रश्नवाचक चिन्ह हैं जिसने माथे पर उभरती रेखाऒं को और गहरा कर दिया है.&lt;br /&gt;मसला यहां ख़त्म हो जाता और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता था कि उपर वाले बहुत बड़े विद्वान थे और सारी भाषाऒं को बोलने में माहिर थे. लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है कि इन भाषाओं के इतिहास पर गौर किया जाये तो यही कोई ८-१०वीं सदी की बात होगी जब भाषाओं का विकास होना शुरु हुआ. उससे पहले बहुत कम भाषाएं अस्तित्व में थी. जबकि अल्लाह-ताला, भगवान्‌, और जीसस जी के इतिहास की कल्पना करना भी पाप है. फिर उनका मोड ऑफ़ कम्युनिकेशन क्या था? उनके समय में तो किसी भाषा का जन्म ही नहीं हुआ था. जब धरती का अस्तित्व सामने आया था उस वक्त तो सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल होता था. फिर भगवान्‍ हिंदी और संस्कृत कैसे बोलने लगे? जीसस को अंग्रेजी कैसे आयी, अल्लाह ने अरबी कहाँ से सीखी? और अगर उन्हे भाषा और बोली आती ही नहीं थी तो वो हमारी इस दुनिया को बगैर संवाद कैसे चलाते आ रहे हैं? चलाते हैं भी या नहीं? वो हैं भी या नहीं? लगा हूं इसी माथा-पच्ची में.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6583190417627870392-1247126955263697957?l=noreligionxceptlove.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/feeds/1247126955263697957/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/04/blog-post.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1247126955263697957'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6583190417627870392/posts/default/1247126955263697957'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://noreligionxceptlove.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='उपर वाले की लैंग्वेज'/><author><name>Rahul Kumar</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_58EbJqqpFqc/SesfY91khhI/AAAAAAAAAAM/DvLdeJwqS48/s72-c/DSC_0123.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry></feed>
