मंगलवार, २४ नवम्बर २००९

YOU BE ALERT & BE SCARED!!


You call us poor.
You call us labour.
You call us rustic.
You call us fool.
You call us servants.

You not only abuse us,
At the same time you use us.
You beat us,
You defeat us,
Sometimes by hook,
Sometimes by crook!!

You exploit us,
You demoralize us,
By showing your feet,
Ferrari & Luxury sweet!!

& I agreed to whatever you said
& I admit that we let you rule us.
But now you be alert,
But now you be careful.
& moreover be scared.

That time is gone,
And we are not alone.
It was just that,
We were unaware
& now I know,
We are everywhere.

Listen to our warning,
Listen to our roar.
What you eat everyday,
is our hard work.
What you wear everyday,
Is our hardwork.
We have been feeding you,
And in return, you duped us all.

We have now got up,
& have grown rebellion.
You are just 30 out of 100,
Rests of all are we!!
We won’t hesitate,
Even in killing.
We have nothing to loose,
And to win,
We have everything that you own.
Better to surrender,
Better to be alert!!

It may be easy to fight with,
A Hindu, A Muslim, A Sikh, & A Christian
But we don’t belong to a different religion,
We belong to a same caste called ‘Common MAN’.

गुरुवार, १९ नवम्बर २००९

सूरज को साहिल तेरे आगे ही ढ़लना होगा…

हर मुश्किल से तुमको निकलना होगा,
ख़ुद ही, अपना ख़ुदा बनना होगा…

चिलचिलाती धूप और कँपकँपाती सर्द,
बेहद क़रीब से इनके गुज़रना होगा…

वक़्त दिखायेगा कभी, कुछ ग़लत राहें,
आँखों को हरदम ही खुला रखना होगा..

डँस लेगा, आस्तीन में छुपा साँप कभी,
उनपे भी तुमको, हौले से हँसना होगा..

तुझे परवाह करने की ज़ुरुरत ही क्या है,
सूरज को 'साहिल' तेरे आगे ही ढ़लना होगा…

शुक्रवार, ३० अक्तूबर २००९

मै अजीबो-गरीब तरीके से मरना चाहता हूँ

इतवार की सुबह वाकई ख़ास रही जब चाय की चुस्कियां और यशवंत भाई के वसीयतनामे पर चर्चा चल रही थी. बहुत दिन से बेरोजगार घूम रहा था.. सोचने के लिए कई दिन पहले एक मुद्दा सूझा था.."क्या है ऊपर वाले की लैंग्वेज".. तब से आज तक माथा-पच्ची करने की ज़ुरूरत नहीं हुई. तो अब शुरू करता हूँ सोचना मैं भी अपनी मौत के बारे...

मैंने देखा है बुढापे में लोगों को खांसते, मैं तो आज भी खांसता हूँ.. लाज़मी है.. सुट्टे जो उडाता हूँ.. सोचता हूँ आज ऐसी हालत है तो बुढापे में क्या होगा. इसलिए मैं ४०-५० के दरमियान ही उठ जाऊं तो अच्छा रहेगा. ऐसा इसलिए भी है की मुझे हर वक़्त किसी का सहारा लेना पड़े, बात-बात पर डॉक्टर का आना-जाना हो, मेरे बच्चे काम की बजाये मुझमे व्यस्त रहें.. वो और उनकी बीवीयाँ मन ही मन कहें, "बुड्ढा उठता क्यूँ नहीं", इससे बेहतर जल्दी पार पा लेना ही है. अगर वो मेरी इज्ज़त भी करते हों फिर भी यही कहेंगे, "पापा को जल्दी मुक्ति मिल जाए तो अच्छा रहेगा, वो बहुत कष्ट में हैं." और कष्ट तो मुझे होना ही है चूँकि मै सिगरेट छोड़ नहीं सकता..
इतना तो तय हो गया कि ४०-५० में उठ जाऊं, अब सवाल है कैसे उठना पसंद करूंगा. स्वाभाविक मौत मुझे अजीब लगती है.. मरने वाला बिस्तर पे अपनी अंतिम साँसे गिन रहा हो... और एकदम से ख़तम.. कुछ मौत से डरते हुए, कुछ मौत को करीब से देखते हुए.
मुझे आप बुजदिल समझे या बेवकूफ.. मगर हकीकत तो यही है कि मै अजीबो-गरीब तरीके से मरना चाहता हूँ जिसमे मेरे प्राण भी निकल जाए और मेरी एक इच्छा (अंतिम इच्छा नहीं कहूँगा, यह पहले भी पूरी हो सकती है.) भी पूरी हो जाए.. मैंने आज तक किसी बड़े एक्सीडेंट को करीब से नहीं देखा है.. तो मेरी चाहत यही है कि किसी बड़ी दुर्घटना में मेरी मौत हो.. जैसे २६/११, ९/११ या ऐसी ही कोई बड़ी घटना.. कोई दंगा, सुनामी, भूकंप, वगैरह-वगैरह.. इस बहाने मेरी मौत की तारीख कोई भूल नहीं पायेगा.
मरने के बाद मेरी लाश का क्या हो? जलाया जाए, दफनाया जाए, बहाया जाए, या यूँ ही बालू-घर में सड़ाया जाए.. सोचेंगे, इसपर भी सोचेंगे. पहले कुछ और भी ज़रूरी बातें रह गयी हैं.. वैसे तो मेरी आँखे -५ पावर के चश्मे से ही चल पाती है, मगर क्या पता इन आँखों से भी कोई ये दुनिया देख ले, इससे मुझे बड़ा पुण्य मिलेगा.. (क्यूंकि अब तक ये आँखे खूबसूरती निहारने के काम ही आयी है). वैसे सच कहूं तो मुझे दूसरों के शरीर के साथ चीड-फाड़ पसंद नहीं है.. मगर मै तो देखने को जिंदा रहूँगा नहीं सो मेरे शरीर की साथ ये किया जाए और मेरी आँखों का इस्तेमाल हो, ऐसी मेरी कामना है. बाक़ी हिस्सों के साथ छेड़-छाड़ ना की जाए.
मै एक कट्टर नास्तिक हूँ. सख्त मजहब विरोधी. "अल्लाह - इश्वर - गॉड" के अस्तित्व को ललकारने और नकारने मे भरोसा रखता हूँ. तो इसलिए किसी रीति-रिवाज़ के मुताबिक मेरा किरया-करम हो, ऐसा मै चाहता नहीं. तो फिर मेरे मुर्दे शरीर का क्या हो.. मेरे हितैषी इसके साथ क्या करेंगे, मुझे पता नहीं.. मगर मेरी इच्छा यही है की मेरे लिए एक छोटा सा घर बनाया जाए मेरे गाँव में. जिसमे बड़ी खिड़कियाँ, बड़े दरवाज़े हों. एक कमरे का घर, तीन तरफ खिड़कियाँ और एक दरवाजा.. छत उसका पिरामिड की शेप में हो.. उस घर के ठीक बीचों-बीच एक छोटा सा चबूतरा टाइप बने, जिसपे उम्दा क्वालिटी के मार्बल्स लगे हो. उसके नीचे मेरे मुर्दे शरीर को जगह दी जाए. कोई भी मंत्र ना पढा जाए इससे मेरे मृत शरीर को दुःख होगा.. हाँ, धुप, बत्ती जलाने पर पाबंदी ना रहे.. इससे वहाँ का वातावरण सही रहेगा.
इस समारोह में वो सारे लोग आमंत्रित रहें जिनसे मेरा कटु या मधुर सम्बन्ध रहा है.. मगर कुछ लोगों को मै चाहूंगा कि ना आयें..
अ) किसी भी पंडित को ना बुलाया जाए.
ब) इंडिया टीवी का कोई रिपोर्टर ना आये. (इन्केस मै कोई नामी-गिरामी पर्सनालिटी बन गया)
स) औपचारिकता निभाने वाले लोग बिलकुल वर्जित हैं.
द) रोने-धोने वाली ग्रामीण महिलाएं ना आये. (वो चिल्लाती ज्यादा, और आंसू कम बहाती हैं)

मेरी ये तमाम इच्छाएं जो भी पूरी कर देगा, वो मेरी तमाम संपत्ति का वारिस होगा. हलाँकि ये एक रिस्क है क्यूंकि जमा पूँजी के नाम पर वर्तमान अन्धकार में है, हाँ कर्ज ज़रूर है.. क्या पता तब तक सही हो जाए..

तो कौन होगा मेरे संपत्ति का अगला वारिस????

शनिवार, १७ अक्तूबर २००९

नफ़रत कहाँ-कहाँ से मिटायें!!


नफ़रत कहाँ-कहाँ से मिटायें!! एक घर की कहानी है. वहाँ एक लड़के का जन्म हुआ. खुशी की बात थी. पहला बच्चा था. वैसे बेटी भी होती तो भी खुशियाँ ही मनायी जाती. घर एक पढ़े-लिखे और सभ्य आदमी का माना जाता था. बच्चे का नाम क्या रखा जाये, सोचा जा रहा था. मुझसे भी एक नाम सुझाने को कहा गया. मैने सोचा क्युं ना इसी बच्चे के बहाने थोड़ी सी ही सही, दूरियाँ पाटने की कोशिश की जाये. मैने फ़ोन करके नाम बतलाया – साहिल. ये नाम मुझे अच्छा लगाता है. अथाह सागर का किनारा. समंदर का दायरा साहिल तक ही तो होता है.
इस फ़ोन-वार्ता के क़रीब एक महीने बाद इनलोगों से मेरा मिलना मुमकिन हुआ. मैनें पूछा, भाई क्या नाम रखा बच्चे का. उनने बताया, बच्चे का नाम उसके दादा जी ने रखा है, मयंक सावर्ण. सुन के अच्छा लगा. “वैसे साहिल नाम भी बुरा नहीं था”, मैनें कहा. “पाग़ल हो गये हैं क्या! ये तो मुस्लिमों वाला नाम है. हम हिन्दु हैं”, आठ साल की एक बच्ची बीच में बोल पड़ी.
ये जवाब किसी बड़े ने दिया होता तो मुझे कोई हैरानी नहीं होती. लेकिन उस बच्ची के इस जवाब ने नाजाने कितने सवाल खड़े कर दिये मेरे मन में!!!
वो घर किसी और का नहीं मेरा ही था. वो नवजात शिशु मेरे बड़े भाई-साहब की पहली संतान थी. और वो बच्ची मेरे सबसे बड़े भाई की इकलौती और दुलारी बेटी थी.
जिस घर में बेटे-बेटी को लेकर कोई भेद-भाव नहीं, वहाँ मजहब को लेकर कितनी ऊँची दीवार बनी है. अब आप ही बताइये, कहाँ कहाँ से मिटाऊँ नफ़रत!!!

गुरुवार, १५ अक्तूबर २००९

आओ!! दरिद्दर भगायें...


“हुक्का पाती लोय-लाय,
लक्ष्मी घर, दरिद्दर बाहर”

पता नहीं दिल्ली में ऐसी कोई रस्म निभायी जाती है कि नहीं. मेरे गाँव में तो हमेशा से ही दिवाली में संठी जलाकर दरिद्दर को बाहर भगाया जाता है. माना जाता है कि लक्ष्मी घर तभी आयेगी जब दरिद्दर बाहर जायेगा. इसकी विद्वानों ने क्या विवेचना की है, क्या पता!! पर सच तो यही है कि किसी ना किसी विधि से इन्हे बाहर भगाने का तरीका ढूंढ ही लिया जाता है. चाहे लक्ष्मी के नाम पर, या कॉमन वेल्थ गेम के नाम पर.
और वैसे भी जिसका भगवान ना हुआ, उसकी दिल्ली कहाँ होगी!!